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भय के दौर में अभय

मनुष्य अपनी जिन खूबियों के कारण विशिष्ट है, उनमें करुणा सबसे ऊपर है। अपनी इस संवेदनात्मक खासियत से वह जब-जब दूर हुआ है, उसके लिए अकल्याणकारी हालात पैदा हुए हैं। कोरोना संकट के मौजूदा हालत में वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक और कार्यकर्ता डॉ अभय बंग ने गांधी के अहिंसक प्रयोगों को सामने रखकर उन नौ सूत्रों की चर्चा की है, जिनसे मनुष्य इस मुश्किल हालात से बाहर निकल सकता है।

करुणा और दया का भाव मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यह काल और परिस्थिति के साथ बढ़ता और घटता है।

प्रेम प्रकाश
महाभारत का यक्ष प्रश्न हो कि श्री कृष्ण का गीता का संदेश। मृत्यु के अप्रत्याशित स्वभाव को हर बार निश्चय की तरह देखने का आग्रह किया गया है। इस बारे में विद्वानों ने जो व्याख्याएं की हैं उनमें भी इसे नियति के बजाय अटल और अखिल सत्य के तौर पर देखने का जोर है। 1899 में बंगाल में प्लेग फैला था। हर तरफ मातमी आलम था। स्वामी विवेकानंद तब कलकत्ता में थे। वे इस बात से आहत हुए कि एक ऐसे समय में जब इंसान को इंसानियत के हक में खड़ा होना चाहिए, एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आना चाहिए तो लोग घरों में मौत के डर से बंद हैं। उन्होंने बहन निवेदिता के साथ मिलकर तय किया कि इस समय अकर्मक बना रहना हम सबके लिए अपराध होगा।

स्वामी ने खासकर युवाओं से आग्रह किया कि वे निर्भीक बनें और आगे आएं। अपने आसपास की सफाई के साथ, पीड़ित लोगों की मदद करें। उन्होंने कहा कि मृत्यु अवश्यंभावी है पर ईश्वर कठोर नहीं है, उदार है। वह आस्था और निर्भीकता दिखाने वाले लोगों के साथ आज भी खड़ा है। उनकी अपील का असर हुआ और देखते-देखते स्थिति में तेज सुधार देखने को मिला। आज भी तकरीबन ऐसी ही स्थिति है। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर बीते वर्ष आई पहली लहर के मुकाबले ज्यादा भयावह है। इंसान से ज्यादा खबरों में लाशें हैं। मनुष्य के लिए मृत्यु का सच ऐसी भयावहता लेकर आया है कि प्रेम, सद्भाव और सहयोग जैसे सामाजिक सरोकार सिरे से गायब हैं। मानवीय करुणा अभी भी बची है, इसके लिए साक्ष्य जुटाने पड़ रहे हैं।

आगे की राह
ऐसे में न सिर्फ महामारी से बचाव की चिंता है बल्कि इस बात की भी चिंता है कि आदमी एक-दूसरे से दूर होकर, भयभीत होकर क्या अपनी हिफाजत कर पाएगा। जाहिर है जवाब होगा नहीं। पर इस नहीं को हम अपने अमल में कैसे लाएं। कैसे यह दिखेगा कि इतिहास में महामारियों के कई दौर और दो-दो विश्वयुद्ध के बाद हम यह सबक सीख गए हैं अपने देशकाल को प्रेम और करुणा से दूर होते देखना कुछ और नहीं बल्कि इंसान के लिए अपने मौलिक दरकारों-सरोकारों से दूर होना है। इसलिए जब कोविड-19 के रूप में महामारी ने पूरी दुनिया में मौत को पहाड़ जैसे आंकड़ों में बदला तो सामाजिक अध्ययन से जुड़े कई विद्वानों ने इस बात की प्रस्तावना दुनिया के आगे रखी कि यह सेहत से ज्यादा सभ्यता का संकट है। जीवन की हिफाजत की चुनौती पर हम तभी खरे हो पाएंगे जब मनुष्यता और उसकी सामाजिकता को भी साथ-साथ बचाएं।

ऐसे में हमें करना क्या है, इस बारे में कई लोगों ने कई तरह के सुझाव दिए हैं। इनमें सबसे अहम है प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक और कार्यकर्ता डॉ अभय बंग के वे नौ सूत्र, जिसे उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत के आधार पर तय किया है। ये नौ सूत्र 1899 में आए प्लेग के समय स्वामी विवेकानंद द्वारा जारी ‘प्लेग मैनिफेस्टो’ की तरह हैं, जो हालात की गंभीरता को नहीं रखांकित करते बल्कि इसका निर्भयता से सामना करने का आह्वान भी करते हैं। डॉ बंग चूंकि खुद एक चिकित्सक हैं तो उनकी बातें किसी भी लिहाज से अतार्किक या हवाई तो नहीं ही ठहराई जा सकती हैं।

तिहरा संकट
डॉ बंग कहते हैं कि आज का वैश्विकसंकट तिहरा है। महामारी के साथ गहन व्यापक आर्थिक मंदी और मानव अस्तित्व को खतरे में डालने वाला पर्यावरणीय परिवर्तन भी हमारे सामने है। इन सबके अलावा, ऐसी परिस्थिति में राह दिखाने वाले राजनीतिक व नैतिक नेतृत्व का दुनियाभर में अभाव है। इसलिए उत्तर तो कहीं और ही ढूंढ़ना पड़ेगा। ऐसे में समाधान की लाठी और रास्ते के साथ सबसे पहले सामने आते हैं महात्मा गांधी। हमें यह सोचना चाहिए कि ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’ कहने वाला यह शख्स ऐसे में क्या करता।

पहले एक आॅनलाइन संबोधन और फिर एक आलेख के तौर पर आए डॉ अभय बंग कुछ ठोस बातें रेखांकित करते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे में महात्मा सबसे पहले तो यह साफ करते कि हम में से हरेक को मौजूदा हालात में आचरण और प्रयोग में ढलना होगा। बड़े से बड़े मुश्किल में गांधी के कार्य करने का यही तरीका है। अब के हालात में भी वे अगर होते तो किसी वैश्विक या अखिल भारतीय अपील की जगह इसके लिए पहले स्थानीय स्तर पर निर्भीकता के साथ कुछ ऐसे प्रयोग करते, जिनसे मनुष्य निर्भय दिखे। प्रेम और करुणा के प्रति उसकी आस्था किसी भी सूरत में डिगे नहीं बल्कि एक मबूत सामाजिक सरोकार में सकर्मक तौर पर बदले। यह वही तरीका है जो यह दिखाता है कि चरखे पर सूत कातने और मुट्ठी भर नमक हाथ में उठाने जैसे साधारण कार्यों का असर भी असाधारण और व्यापक होता है।

समाधान के सूत्र
डॉ अभय बंग जिन नौ सूत्रों की चर्चा करते हैं, उनमें पहला सूत्र है- भयमुक्ति। वे कहते हैं कि आज विषाणु की अपेक्षा विषाणु का भय अधिक है। ऐसे में गांधी सबसे पहले हमसे कहते- ‘निर्भय हो!’ विषाणु की वजह से होने वाली मृत्यु को मनुष्य की सामाजिक रचना और उसकी विशालता पर हावी देखना या दिखाना गलत है। लिहाजा मौत का हौआ खड़ाकर हम कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे सिवाय इसके कि हम खुद को और असहाय और हालात को और चिंताजनक होने की छूट दें।

रोगियों की सेवा, गांधीजी की सहज प्रवृत्ति थी। बोअर युद्ध, प्रथम विश्वयुद्ध, भारत में महामारियों के दौरान कुष्ठरोग के शिकार विकलांग परचुरे शास्त्री को सेवाग्राम में अपनी कुटिया के करीब रखकर स्वयं उनकी सेवा करना, इसके उदाहरण हैं।

लिहाजा दूसरे सूत्र के तौर डॉ बंग रुग्ण सेवा की चर्चा करते हैं और कहते हैं मौजूदा हालात में कोरोनाग्रस्त रोगियों की देखभाल वे स्वयं करते। इसके साथ ही वे स्वास्थ्य विज्ञान के महंगे विकल्पों के बजाय इस कोशिश में लगते कि स्थानीय और प्राकृतिक तौर पर इस महामारी से लड़ने के लिए क्या किया जा सकता है। कर्तव्यबोध के लिए गांधीजी का दिया ‘जादू का जंतर’ प्रसिद्ध है। इसमें महात्मा कहते हैं, ‘आज तक तुमने सबसे दुखी, सबसे निर्बल जिस आदमी को देखा है। उसे याद करो, वह तुम्हारा कर्तव्य है।’

तीसरे सूत्र की बात करते हुए डॉ बंग उन लोगों के हालात को सामने रखते हैं जिन्हें महामारी की रोकथाम के नाम पर लगी पूर्णबंदी ने दाने-दाने को मोहताज बना दिया। उनका रोजगार छिन गया। वे रातोंरात सड़क पर आ गए। साफ है कि ऐसे में गांधी दांडी जैसी एक और यात्रा पर निकलते। वे गांव-कस्बों तक पहुंचते और विस्थापित हुए लोगों के भोजन, दवा और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी व्यवस्था को तलाशते। साथ ही वे ऐसे तमाम लोगों के आत्मसम्मान और उम्मीद को जीवित रखने की भरसक कोशिश करते।

सद्भावना और प्रार्थना
तीसरा और चौथा सूत्र है- धार्मिक और सामाजिक एकता तथा सबके लिए अपने पड़ोसी की फिक्र करने की हिदायत। प्रेम और करुणा से विमुख खोने का खमियाजा तारीख में इंसान ने कई बार भुगता है। मौजूदा संकट के बीच हमें इनसे सबक लेने की जरूरत है। खुद महात्मा ने इस बात पर जोर दिया कि सद्भाव के बिना न तो कोई व्यक्ति सुरक्षित है और न ही समाज। कोरोना संकट के बीच सुरक्षित सामाजिक दूरी की चर्चा खूब हो रही है। शब्द प्रयोग में चूक के कारण इससे गलत संदेश गया है। दरअसल, शारीरिक दूरी की जरूरत है न कि सामाजिक दूरी की। इसी तरह गलतियों का स्वीकार और उसके लिए प्रायश्चित जरूरी है। पांचवे सूत्र में डॉ बंग कहते हैं सरकार और समाज सबको अपनी उन गलतियों को मानना चाहिए जिससे इस महामारी को फैलने में मदद मिली। चूक समझ में आ जाए तो आगे के निर्णय में सुधार होगा।

अगले सूत्र में डॉ बंग स्थानीय स्वराज की बात करते हैं। वे कहते हैं कि विकास और सत्ता के मजबूत और केंद्रीकृत मॉडल के नाम पर हम भले बड़े-बड़े दावे कर लें, पर जब तक विकेंद्रित आधार पर मनुष्य के अधिकार और स्वावलंबन की चिंता नहीं होगी तो हम कई तरह की मुश्किलों से घिरे रहेंगे और लोककल्याण का लक्ष्य और दूर होता जाएगा। इसी क्रम में आठवें सूत्र के तौर पर डॉ बंग आवश्यकता के विवेक की चर्चा करते हैं। गांधी कहते थे, ‘यह धरती सभी की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी है लेकिन लालच के लिए बहुत छोटी है।’ अनावश्यक उत्पादन और फिर उनके अंधाधुंध उपभोग के चक्र में फंसकर हमने सिर्फ खोया है, हासिल कुछ नहीं किया है।

प्रार्थना गांधी के लिए रोज का कर्मकांड नहीं बल्कि सत्य का ऐसा प्रयोग है, जिससे वे खुद के साथ सबके अंदर की करुणा को जगाते हैं। द्वेष और हिंसा की निरर्थकता के प्रति आंतरिक मजबूती को गढ़ने की कोशिश करते हैं। जाहिर है कि मौजूदा हालत में भी महात्मा अगर होते तो वे हम सबके साथ मिलकर मानवता के कल्याण और सर्वत्र शांति-सद्भाव के लिए हृदय से प्रार्थना कर रहे होते।

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