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छह गांव का बने समूह

गांव में जिस भी व्यक्ति को यह संक्रमण हो रहा है, वह सामाजिक बहिष्कार या अन्य किसी डर से जांच नहीं करा रहा है। गांव के संक्रमित लोग इस बीमारी को सामान्य बुखार मान रहे हैं और उसी तरह का इलाज भी कर रहे हैं। इससे वहां मौत के मामले बढ़े हैं।

गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारे बिना समाज विकास की बात बेमानी है।

गांवों को लेकर सरकारी स्तर पर कोई चिंता नहीं है, ऐसा नहीं है। बल्कि कोरोना महामारी के दौरान इस चिंता को दूर करने के लिए कई वैकल्पिक सुझाव भी सामने आए हैं। मौजूदा हालात की चर्चा करते हुए कई राज्यों और केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में आपदा प्रबंधन के सलाहकार रहे और महात्मा गांधी नेशनल काउंसिल ऑफ रूरल एजुकेशन (एमजीएनसीआरई) के चेयरमैन डॉ डब्लूजी प्रसन्ना कुमार कहते हैं कि कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों तक कोरोना संक्रमण पहुंच गया है। हालांकि संक्रमण के दर्ज मामले कम हैं। इसके दो कारण हैं। पहला, स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि कोरोना संक्रमण खुली जगह के मुकाबले बंद जगह पर अधिक फैलता है।

गांवों में खुली जगह की कोई कमी नहीं है। दूसरा, यह कि गांव में जिस भी व्यक्ति को यह संक्रमण हो रहा है, वह सामाजिक बहिष्कार या अन्य किसी डर से जांच नहीं करा रहा है। गांव के संक्रमित लोग इस बीमारी को सामान्य बुखार मान रहे हैं और उसी तरह का इलाज भी कर रहे हैं। इससे वहां मौत के मामले बढ़े हैं। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के प्रकोप ने जैसे ही गांवों का रुख किया, वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जरता हर स्तर पर जाहिर हुई। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कौन कहे, कुछेक जिला अस्पतालों को छोड़ ज्यादातर की स्थिति खासी बुरी है। कहीं दवा नहीं है तो कहीं डॉक्टर नहीं आते हैं।

कुछ अस्पतालों की इमारतों का उपयोग जानवर तक करते हुए दिख जाएंगे। इन अस्पतालों में जाकर बीमार तो हुआ जा सकता है, इलाज होना मुश्किल है। ग्रामीण स्थिति को लेकर गहरी समझ रखने वाले डॉ कुमार भी इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं। वे इस दिशा में सुधार के लिए कुछ विकल्प भी सुझाते हैं। उन्हें लगता है कि मौजूदा संकट से उबरने के लिए चार से छह गांवों को मिलाकर एक समूह बनाना चाहिए।

इस समूह के गांवों में मौजूद आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी में काम करने वाली महिलाओं आदि से सभी गांवों के हर घर में बीमार लोगों की निगरानी कराई जाए। जिन लोगों में कोरोना संक्रमण की आशंका हो, उन्हें इस समूह द्वारा संचालित पृथकवास केंद्र में भेज देना चाहिए। इस केंद्र में डिजिटल माध्यम से किसी डॉक्टर की सहायता से मरीजों के इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। समूह के गांवों की पंचायतों की यह जिम्मेदारी हो कि इस कार्य के लिए वो धनराशि जुटाए।

इसमें कहीं दो राय नहीं कि गांव के समूह बनाकर न सिर्फ ऐसी महामारी में काम किया जा सकता है बल्कि किसी भी आपदा के समय ये खासे कामयाब भी हो सकते हैं। सभी राज्यों को चाहिए कि एक योजना बनाकर गांवों के ऐसे समूह तैयार करें क्योंकि हर गांव में न अस्पताल बनाना मुमकिन है और न ही उन्हें चलाना। जिला अस्पतालों के बारे में डॉ कुमार कहते हैं कि राज्य सरकारों को चाहिए कि वे हर जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज घोषित करें। इससे एक तो वहां लगातार डॉक्टर उपलब्ध रहेंगे और लोगों को बेहतर इलाज जिला स्तर पर ही मिल जाएगा। दूसरा, देश में डॉक्टरों की कमी की समस्या को भी दूर करने में मदद मिलेगी। लेकिन यह काम दो-तीन सालों का नहीं है।

हर जिले में मोबाइल स्वास्थ्य तंत्र विकसित करने की बात भी इन दिनों खूब हो रही है। इस बारे में डॉ कुमार कहते हैं कि यह तंत्र जिले के अस्पताल से जुड़ा होना चाहिए और एक अंतराल पर हर गांव में लोगों की सेवा के लिए इनका पहुंचना सुनिश्चित हो। इससे छोटी बीमारियों के इलाज के लिए ग्रामीणों को जिले तक भी आने की जरूरत नहीं होगी।

महामारी के खिलाफ सबको आना होगा साथ
कोविड-19 महामारी के वैश्विक प्रकोप ने दुनिया के तमाम बड़ी और शीर्ष नियामक संस्थाओं को चिंता में डाल दिया है। खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र इस बारे में लगातार चिंता जता रहा है और दुनिया के देशों से महामारी के खिलाफ ठोस और एकजुट पहल करन की अपील कर रहा है। संयुक्तराष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस का साफ कहना है-‘कोविड-19 को एक समय में एक देश से नहीं हराया जा सकता है।’

जिनेवा में चल रही विश्व स्वास्थ्य सभा में एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, ‘विश्व के नेताओं को टीकों, परीक्षणों और उपचारों की समान पहुंच के लिए वैश्विक योजना के साथ तत्काल कदम उठाना चाहिए।’ उन्होंने जी-20 टास्क फोर्स के लिए अपनी अपील दोहराई, जो सभी देशों को टीके की उत्पादन क्षमता, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ), एसीटी-एक्सेलरेटर पार्टनस, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और अन्य प्रमुख हितधारकों को एक साथ लाती है।

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