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बंग-भंग और हिंद स्वराज

बंग-भंग विरोधी आंदोलन का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि आगे चलकर भारतीय स्वाधीनता संघर्ष का शीर्ष नायक पहले ही यह भविष्यवाणी कर देता है कि विभाजन का फैसला फिरंगी हुकूमत को हर हाल में वापस लेना होगा। बंगाल के क्रांतिकारी मिजाज को गांधी न सिर्फ समझ रहे थे बल्कि वे यह भी भरोसा कर रहे थे कि इस विरोध और संघर्ष की आग ही आगे चलकर भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की मशाल को रोशन करेगी।

बंगाल विभाजन का महात्मा गांधी ने कड़ा विरोध किया था। (फोटो- जनसत्ता फाइल)

महात्मा गांधी ने 1909 में ‘हिंद स्वराज‘ लिखी। यह न सिर्फ गांधी विचार के लिहाज से बल्कि सभ्यता विमर्श और भारत के स्वाधीनता संघर्ष के लिहाज से भी एक अहम दस्तावेज है। गांधी इस पुस्तिका में जिन चुनिंदा मुद्दों की चर्चा प्रश्नोत्तरी के रूप में ठोस दलीलों के साथ करते हैं, उसमें बंग-भंग शामिल है। बल्कि इसकी चर्चा वे पुस्तिका के दूसरे ही अध्याय में करते हैं। इस प्रसंग में बंग-भंग और कांग्रेस की भूमिका के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में वे कहते हैं, ‘बीज हमेशा हमें दिखाई नहीं देता। वह अपना काम जमीन के नीचे करता है और जब खुद मिट जाता है तब पेड़ जमीन के ऊपर देखने में आता है।

कांग्रेस के बारे में ऐसा ही समझिए। जिसे आप सही जागृति मानते हैं, वह तो बंग-भंग से हुई, जिसके लिए हम लॉर्ड कर्जन के आभारी हैं। बंग-भंग के वक्त बंगालियों ने कर्जन साहब से बहुत प्रार्थना की, लेकिन वे साहब अपनी सत्ता के मद में लापरवाह रहे। उन्होंने मान लिया कि हिंदुस्तानी लोग सिर्फ बकवास ही करेंगे, उनसे कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने अपमान भरी भाषा का प्रयोग किया और जबरदस्ती बंगाल के टुकड़े किए। बंग-भंग से जो धक्का अंग्रेजी हुकूमत को लगा, वैसा और किसी काम से नहीं लगा। इसका मतलब यह नहीं कि जो दूसरे गैर-इंसाफ हुए, वे बंग-भंग से कुछ कम थे।’

साफ है कि गांधी तब से इस बात को मान रहे थे कि बांग्ला अस्मिता और संस्कृति से खिलवाड़ एक ऐसा कृत्य है जिसका असर बांग्ला समाज पर तो पड़ेगा ही, खुद ब्रितानी हुकूमत के लिए भी यह महंगा सौदा साबित होने वाला है। गौरतलब है कि गांधी जब ये बात कह रहे हैं तब बंग-भग का फैसला प्रभावी था। काफी विरोध के बाद 1912 में ब्रितानी सरकार ने इसे अमान्य करार दिया। वस्तुत: गांधी बंगाल के विभाजन को एक ऐसी घटना के तौर पर देख रहे थे जिसका देश के स्वाधीनता संघर्ष पर बड़ा असर पड़ने वाला था। इस संबंध में वे जो एक बात और अहम कहते हैं वह है बांग्ला समाज के विरोध के बारे में। वे कहते हैं, ‘बंगाल के टुकड़े करने का विरोध करने के लिए प्रजा तैयार थी।

उस वक्त प्रजा की भावना बहुत तेज थी। उस समय बंगाल के बहुतेरे नेता अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार थे। अपनी सत्ता, अपनी ताकत वे जानते थे। इसलिए तुरंत आग भड़क उठी। अब वह बुझने वाली नहीं है, उसे बुझाने की जरूरत भी नहीं है। ये टुकड़े कायम नहीं रहेंगे, बंगाल फिर एक हो जाएगा। लेकिन अंग्रेजी जहाज में जो दरार पड़ी है, वह तो हमेशा रहेगी ही। वह दिन-ब-दिन चौड़ी होती जाएगी। जागा हुआ हिंद फिर सो जाए, यह नामुमकिन है। बंग-भंग को रद्द करने की मांग स्वराज की मांग के बराबर है। बंगाल के नेता यह बात खूब जानते हैं। अंग्रेजी हुकूमत भी यह बात जानती है।’

बंग-भंग विरोधी आंदोलन का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि आगे चलकर भारतीय स्वाधीनता संघर्ष का शीर्ष नायक पहले ही यह भविष्यवाणी कर देता है कि विभाजन का फैसला फिरंगी हुकूमत को हर हाल में वापस लेना होगा। बंगाल के क्रांतिकारी मिजाज को गांधी न सिर्फ समझ रहे थे बल्कि वे यह भी भरोसा कर रहे थे कि इस विरोध और संघर्ष की आग ही आगे चलकर भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की मशाल को रोशन करेगी।

बंग-भंग विरोधी आंदोलन की महत्ता को गांधी चरणबद्ध तरीके से जिस तरह रेखांकित करते हैं उसमें एक बात जो और गौर करने की है वह यह कि गांधी देश के उस दुर्भाग्यपूर्ण भविष्य को भी कहीं न कहीं देख रहे थे जिसमें विभाजन का ब्रितानी दांव देश के स्वाधीनता संघर्ष को भी दो धाराओं में बांटकर रख देगा। ‘हिंद स्वराज’ में वे इस बारे में कहते हैं, ‘बंग-भंग से जैसे अंग्रेजी जहाज में दरार पड़ी है, वैसे ही हममें भी दरार-फूट-पड़ी है। बड़ी घटनाओं के परिणाम भी यों बड़े ही होते हैं।

हमारे नेताओं में दो दल हो गए हैं- एक मॉडरेट और दूसरा एक्स्ट्रीमिस्ट। उनको हम धीमे और उतावले कह सकते हैं (नरम दल व गरम दल शब्द भी चलते हैं)। यह सच है कि ये जो दल हुए हैं, उनके बीच जहर भी पैदा हुआ है। एक दल दूसरे का भरोसा नहीं करता, दोनों एक-दूसरे को ताना मारते हैं।’ गांधी का आकलन आज भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का वह इतिहास है जिसमें जोश और होश कई बार अलग-अलग छोर पर साफ-साफ खड़े दिखाई पड़ते हैं।

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