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स्त्री का पक्ष

ज्योति सिडाना भारतीय समाज, खासकर हिंदू समाज के सामने एक सांस्कृतिक-वैधानिक अंतर्विरोध वैवाहिक संबंधों के क्षेत्र में उभरा है। अफसोस इस बात का है कि समाज वैज्ञानिकों ने इसे एक सार्वजनिक विमर्श का रूप नहीं दिया। वैवाहिक संबंधों की व्याख्या अब तक धर्म केंद्रित पुरुष सत्तात्मकता से परिभाषित होती रही है। भारतीय संविधान ने इस […]

Author May 23, 2015 3:34 PM

ज्योति सिडाना

भारतीय समाज, खासकर हिंदू समाज के सामने एक सांस्कृतिक-वैधानिक अंतर्विरोध वैवाहिक संबंधों के क्षेत्र में उभरा है। अफसोस इस बात का है कि समाज वैज्ञानिकों ने इसे एक सार्वजनिक विमर्श का रूप नहीं दिया। वैवाहिक संबंधों की व्याख्या अब तक धर्म केंद्रित पुरुष सत्तात्मकता से परिभाषित होती रही है। भारतीय संविधान ने इस व्याख्या को शुरू से ही चुनौती दी है। लेकिन राज्यसभा के एक सांसद जब विवाह को एक परंपरा और संस्कार के रूप में स्थापित करते हुए पति द्वारा पत्नी के बलात्कार की संभावना को नकारते हैं तो सवाल उठता है कि क्या पति और पुरुष ही इस देश के नागरिक हैं और महिलाओं, खासतौर पर पत्नी की नागरिकता का निर्धारण पति की व्याख्याओं या उसके निर्देशन पर केंद्रित होगा! अगर ऐसा है तब फिर परिवार में बालश्रम और बलात् श्रम भी नहीं हो सकता, क्योंकि इसका विवेचन और निर्देशन भी विवाह के बाद बलात्कार की तरह धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर किया जाना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में महिला अपने पति, भाई या पुत्र जैसे किसी पुरुष की निजी संपत्ति नहीं हो सकती।

जो बलात्कार वैवाहिक संबंधों में पुरुष की इच्छा, नियंत्रण और पत्नी पर संपूर्ण आधिपत्य का द्योतक है, वह कैसे विवाह की उद्देश्य प्रणाली को निर्मित कर सकता है? ऐसा लगता है कि महिला कोई इंसान नहीं, वस्तु है, जिस पर पति यानी पुरुष का स्वामित्व है। यह एक विरोधाभास ही है कि एक तरफ हम विश्व मंचों पर महिला सशक्तीकरण, लैंगिक समानता, बेटी बचाओ और विकास कार्यों में महिलाओं की समान सहभागिता जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं, वहीं वैवाहिक बलात्कार को कानूनी स्वीकृति देने की कोशिश हो रही है। यह पुरुष सत्तात्मक समाज के यथार्थ को दिखाता है। अगर निजी स्तर पर महिला को एक वस्तु या संपत्ति के रूप में प्रयुक्त किया जाता है तो सार्वजनिक रूप से हम उसके प्रति समानता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? या फिर हम यह मानते हैं कि स्त्री के पास केवल शरीर है, मस्तिष्क नहीं? वह पति, बच्चों और घर-परिवार की बात कर सकती है, लेकिन राजनीति, अर्थ-प्रणाली, चुनाव प्रक्रिया और सेक्स के पक्षों पर खुल कर बात नहीं कर सकती! क्यों?

सवाल है कि लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य में कौन महत्त्वपूर्ण है- संविधान, संविधान निर्देशित कानून या फिर धर्म केंद्रित औपचारिक प्रतिमान। अगर हम संविधान और कानून के शासन को स्वीकृति प्रदान करते हैं तो फिर जबर्दस्ती किया गया कोई भी कृत्य, खासतौर पर यौन संबंध न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि कानून के शासन का खुला उल्लंघन है। ऐसा लगता है कि वैवाहिक संबंधों में बलात्कार की अनदेखी करके हम समाज में पुनरुत्थानवाद को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह सवाल नागरिकता की व्याख्या और नागरिक की आजादी से जुड़ा है। इसलिए इस विमर्श को व्यापक बनाना जरूरी है, ताकि यह स्थापित किया जा सके कि स्त्री और पुरुष नागरिक हैं, या फिर केवल पुरुष नागरिक है और पत्नी के रूप में स्त्री दोयम दर्जे की नागरिक है। पत्नी को पति और अपने परिवार के किसी भी दबाव और बाध्यतामूलक संबंध को इसलिए स्वीकार कर लेना चाहिए कि उसने पत्नी का पद संस्कार के जरिए हासिल किया है। संस्कार उसे बाध्यतामूलक संबंधों को जीने की सांस्कृतिक स्वीकृति देते हैं, जिसे धर्म और पुरुष सुनिश्चित करता है। हिंदू विवाह अधिनियम और सिविल विवाह अधिनियम का कोई भी नियम बाध्यकारी यौन संबंध को स्वीकृति प्रदान नहीं करता। दरअसल, ऐसा संबंध पत्नी को दासी बनाने का एक प्रयास है। त्रासदी यह है कि महिलाओं को फिर ‘दासी’ (एक सीमा तक देवदासी, क्योंकि संस्कारों में पति ‘ईश्वर’ है!) के रूप में देखने की कोशिश लोकतंत्र के उस मंदिर में दिखी, जिसे समूचा विश्व भारतीय संसद की संज्ञा देता है।

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