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विकास की मार

प्रशांत कुमार गुजरते जमाने के साथ खेती-किसानी अब घाटे का सौदा बन चुकी है। कहने की जरूरत नहीं कि किसानों और खेती योग्य जमीन पर चौतरफा हमले बढ़े हैं। अब तक की सरकारों की नीतियों ने खेती पर पहले से ही कहर ढाया हुआ था। फिर मौजूदा केंद्र सरकार पूर्ववर्ती यूपीए सरकार से बीस साबित […]

Author May 7, 2015 8:31 AM

प्रशांत कुमार

गुजरते जमाने के साथ खेती-किसानी अब घाटे का सौदा बन चुकी है। कहने की जरूरत नहीं कि किसानों और खेती योग्य जमीन पर चौतरफा हमले बढ़े हैं। अब तक की सरकारों की नीतियों ने खेती पर पहले से ही कहर ढाया हुआ था। फिर मौजूदा केंद्र सरकार पूर्ववर्ती यूपीए सरकार से बीस साबित हो रही है। सरकार उसी ढर्रे पर तेजी से बढ़ती जा रही है, जिस रास्ते को पिछले कई सालों से कृषि दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। औपनिवेशिक काल में अंगरेजों ने कई परियोजनाओं को शुरू करने के लिए किसानों से उनकी भूमि लेना प्रारंभ किया। यह कानून जबरन भूमि अधिग्रहण को सही ठहराता था। इसे पहले यूपीए सरकार ने नया रूप देकर लागू किया। लेकिन अब राजग सरकार पूंजीपतियों के दबाव में आकर जमीन की लूट को कानूनी जामा पहनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगी है। वहीं लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त हार के बावजूद विपक्ष अब हरकत में आ गया है।

हमारे नीति-नियंताओं ने विकास मॉडल के रूप में कथित ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ का अनुसरण किया और विकास का लाभ ऊपर से नीचे की तरफ रिसने की बात कही। लेकिन आजादी के बाद साढ़े छह दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बावजूद आबादी के अधिकांश हिस्से को आज दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है। सवाल है कि उन सारी नीतियों और योजनाओं का क्या जो गरीबी हटाओ और जीवन स्तर सुधारने के नाम पर बनाई जाती हैं और जिनके लिए अरबों रुपए वारे-न्यारे हो जाते हैं। निजीकरण, वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर सरकार की योजनाएं दरअसल मुट्ठी भर पूंजीपतियों और कॉरपोरेट के खिलाड़ियों के हितों की पूर्ति के लिए बनाई जाती हैं।

‘स्टेट पावर’ और कॉरपोरेट का गठजोड़ हो जाता है। इसके साथ ही तमाम तरह की नीतियों के माध्यम से वैश्विक पूंजी के हितों की खातिरदारी में सरकार मशगूल हो जाती है। बांध परियोजनाओं के नाम पर न जाने कितने लोगों की जमीन ले ली गई, उनके घर उजाड़े गए। मगर आज तक उन्हें बसाया नहीं जा सका। विस्थापितों की संख्या देश में तेज गति से बढ़ रही है और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को जबरन कब्जाया जा रहा है। इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि जहां-जहां इस देश में आदिवासी आबादी ज्यादा बसती है, वहां कोयले और दूसरे खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधन भरपूर मात्रा में मिलते हैं। ये इलाके हैं झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ आदि। इसीलिए सरकार और कॉरपोरेट के खिलाड़ी इस मौके को अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते।

उदारीकरण के बाद सभी सरकारें इसी राह पर चलती नजर आती हैं। पूंजीवादी देश अमेरिका भारत सरकार द्वारा किसानों की दी जाने वाली सबसिडी पर नाराजगी जताता है, मगर वह यह नहीं सोचता कि खुद अमेरिका में किसानों के लिए एक सौ बीस अरब डॉलर की सबसिडी दी जाती है। कई बार खाद्य सुरक्षा के नाम पर दी जा रही सबसिडी के लिए भी अमेरिका भारत को आंखें दिखा चुका है। देश की बहुसंख्यक आबादी के जीने का आधार कृषि है। मगर विगत कुछ सालों में खेती और किसानी सरकार के नीतिगत बदलावों से दूर हैं। कई तरह के संकट कृषि पर मंडरा रहे हैं। सरकार बुलेट ट्रेन के लिए जहां साठ हजार करोड़ रुपए खर्च करने को तैयार है, वहीं कृषि कर्ज माफी के लिए उसने केवल दस हजार करोड़ दिए। किसान आत्महत्या करे, मगर इससे सरकार को क्या! बारहवीं पंचवर्षीय योजना के मुताबिक आजादी के बाद से देश के करीब छह करोड़ लोग विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापित किए गए हैं। इनमें से चालीस फीसदी आदिवासी हैं।

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