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स्त्रीत्व का पक्ष

नीलिमा चौहान जब भी स्त्री को अतिरिक्त सम्मान देने के पारंपरिक उत्सव मनाए जाते हैं तो न चाहते हुए भी मेरा ध्यान उन उत्सवों, मान्यताओं, आयोजनों की पृष्ठभूमि के निहितार्थों की ओर चला जाता है। मातृत्व के प्रबल उत्सवीकरण पर स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता से संबद्ध कई सवाल मन में उठ रहे हैं। दरअसल, […]

Author June 8, 2015 3:47 PM

नीलिमा चौहान

जब भी स्त्री को अतिरिक्त सम्मान देने के पारंपरिक उत्सव मनाए जाते हैं तो न चाहते हुए भी मेरा ध्यान उन उत्सवों, मान्यताओं, आयोजनों की पृष्ठभूमि के निहितार्थों की ओर चला जाता है। मातृत्व के प्रबल उत्सवीकरण पर स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता से संबद्ध कई सवाल मन में उठ रहे हैं। दरअसल, संतानोत्पत्ति का यंत्र होने से इतर भी स्त्री का अस्तित्व है, इस बात की कल्पना को ही भयावह बना दिया गया है। हर स्त्री अपने लिए सबसे पहले संतानवती होने की कामना करती है। घर-परिवार और समाज में बच्चों की उपस्थिति के बावजूद हर स्त्री को अपनी कोख को उर्वर सिद्ध करने के लिए मातृत्व की इच्छा के वशीभूत हो जाना बहुत सहज और स्वाभाविक बात लगती है।

आमतौर पर स्त्री यह जान ही नहीं पाती कि संतानोत्पत्ति और उत्तराधिकार के लिए प्रकृति की अपने प्रति अनुकूलता को सिद्ध करने, समाज में सम्मान पाने और विवाह संस्था में खुद को बनाए रखने के लिए वह अक्सर यह निर्णय स्वेच्छा से नहीं ले रही होती। दरअसल, मातृत्व के निर्णय को वह अपना अधिकार मानती भी नहीं है। विवाह, ससुराल की मांग, सामाजिक दबाव उसे मातृत्व की ओर धकेलते हैं। मां बनने की शारीरिक योग्यता भर से मां बन जाने की विवशता स्त्री को अपने अस्तित्व के साथ-साथ मानवाधिकार के विरुद्ध भी लगनी चाहिए।

गुड़िया से खेलती बच्चियों को हम बचपन से ही मां होने का प्रशिक्षण देते हैं। दरअसल, हम अपने सामाजिक संस्कारों को बच्चियों पर सगर्व लादते हैं। मेरी पड़ोसन कहती थी कि आसपास जब भी कोई गाय बछड़ा देती है, मैं बेटियों को जरूर दिखाती हूं, ताकि वह बचपन से ही मां बनने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाए। मुझे याद है कि सोलह-सत्रह साल की उम्र में ही मैं डरने लगी थी कि अब बस कुछ सालों में मुझे इस यातना से दिखावटी खुशी के साथ गुजरना पड़ेगा। उस उम्र में मुझे यह लगता था कि पढ़ाई और जीवन में कुछ नया करने की कामना के आड़े यही दबाव सबसे बड़ी अड़चन है। इस दबाव के चलते मुझे विवाह भी एक भयावह विचार लगता था।

आज कॉलेज में प्रथम वर्ष की पतली-दुबली गर्भवती बच्चियों को देख कर मैं गहरी पीड़ा और आवेश से भर जाती हूं और बाकी बच्चियों को यह सीख देने का मन करता है कि मातृत्व ही एकमात्र तुम्हारी पहचान नहीं है। मां बनने से पहले इंसान होने का दर्जा तो हासिल जरूर कर लेना मेरी बच्चियों! यह शरीर तुम्हारा है। इसे और अपनी कोख को कभी गुलाम मत बनने देना। तुम अपने पैरों पर खड़ी होना, ताकि अपने गर्भ और उससे पैदा बच्चे को अपनी पूंजी मान कर गुलामी और आश्रित की जिंदगी जीने के परंपरागत खयाल से नफरत कर सको। तुम इस्मत चुगताई की कहानी पढ़ती हो न? बस उस कहानी की छुई-मुई मत बनना! ‘बांझ’ या ‘निपूती’ होने की धमकियों में कभी मत आना। अपने होने की संभावनाओं को खोजो… अपनी आजादी को महसूस करो। मातृत्व तो स्त्रीत्व का एक पक्ष भर है, उसे बस उतना ही महत्त्व देना।

मेरा मानना है कि हर स्त्री को मां बनने के अपने फैसले को अपनी इच्छा, आवश्यकता, क्षमता, ऊर्जा और हर्ष के साथ स्वाधिकार की तरह समझना शुरू करना चाहिए! भूमि और संपत्ति के वारिस पैदा कर सामंती व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह समाज उतावला है। स्त्री के गर्भ को साधन के रूप में देखने वाले भाव को छिपा कर उसे महिमापूर्ण और दैवीय सिद्ध करने के पीछे एक खास तरह का सामंती विचार काम करता है। वहीं मां बन कर स्त्री समझती है कि उसने स्त्रीत्व की पूर्णता का अनिवार्य तमगा समाज से हासिल कर लिया! स्त्री को इससे मुक्त होने की शुरुआत करनी चाहिए कि मातृत्व और स्त्रीत्व परस्पर पूरक हैं।

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