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आजादी की कीमत

कृति श्री भारत में सत्तर के दशक का दलित पैंथर आंदोलन अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन और मैल्कम एक्स के विचारों से प्रभावित रहा। ब्लैक पैंथर की स्थापना के ठीक एक साल पहले इक्कीस फरवरी 1965 को मैल्कम एक्स को उस समय पंद्रह गोलियां मारी गर्इं, जब वे ‘हरलेम’ में व्याख्यान देने जा रहे थे। […]

Author May 27, 2015 11:54 AM

कृति श्री

भारत में सत्तर के दशक का दलित पैंथर आंदोलन अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन और मैल्कम एक्स के विचारों से प्रभावित रहा। ब्लैक पैंथर की स्थापना के ठीक एक साल पहले इक्कीस फरवरी 1965 को मैल्कम एक्स को उस समय पंद्रह गोलियां मारी गर्इं, जब वे ‘हरलेम’ में व्याख्यान देने जा रहे थे। उन्नीस मई 1925 को अमेरिका के ओमाहा में एक गरीब परिवार में जन्मे मैल्कम जब महज छह साल के थे तो 1931 में उनके पिता की हत्या गोरों के एक प्रतिक्रियावादी संगठन ‘कू क्लक्स क्लान’ के लोगों ने कर दी। एक अन्य घटना ने मैल्कम को बुरी तरह हिला दिया था। एक बार उनके घर में आग लगी और फायर ब्रिगेड वालों ने जब देखा कि आग एक काले के घर में लगी है तो बिना आग बुझाए वापस लौट गए। बाद में गोरों और अमेरिकी लोकतंत्र के प्रति उनके जो विध्वंसक विचार बने, उनमें इन घटनाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। किशोरावस्था में किसी छोटे अपराध के लिए उन्हें छह साल जेल की सजा काटनी पड़ी। जेल से निकलने के बाद सबसे पहले उन्होेंने ईसाई धर्म छोड़ कर इस्लाम ग्रहण कर लिया और काले मुसलिम लोगों के संगठन ‘नेशन आॅफ इस्लाम’ के सदस्य बन गए। इस दौरान बहुत से काले लोगों ने सामूहिक तौर पर प्रतिक्रियास्वरूप ईसाइयत छोड़ कर इस्लाम ग्रहण कर लिया।

इसी दौरान मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी सक्रिय थे। उनका ‘सिविल राइट्स मूवमेंट’ अपने उभार पर था। मार्टिन लूथर किंग इसी व्यवस्था में अमेरिकी लोकतंत्र के ‘मूल्यों’ को जमीन पर उतारते हुए काले लोगों के अधिकारों की गारंटी चाहते थे। जबकि मैल्कम ऐसे किसी अमेरिकी मूल्य के अस्तित्व से ही इनकार करते थे। वे अमेरिकी लोकतंत्र को एक साम्राज्य मानते थे और इसके विध्वंस में ही काले लोगों की मुक्ति देखते थे। फिर समाजवाद की ओर झुकने के बाद उन्होंने काले लोगों की मुक्ति को गोरे उत्पीड़ित मजदूरों और अन्य शोषित समुदायों के साथ जोड़ कर देखना शुरू किया। मैल्कम एक्स का कहना था कि अमेरिका विदेशों में नहीं, बल्कि देश में भी एक उपनिवेश बनाए हुए है, जिसमें मुख्य रूप से काले लोग और यहां के मूल निवासी ‘रेड इंडियंस’ हैं।

एक जगह मैल्कम एक्स ने लिखा है- ‘अगर गोरों की वर्तमान पीढ़ी को उनका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे खुद गोरों के विरोधी हो जाएंगे।’ इस कथन के गहरे मायने हैं। हम भी भारत के संदर्भ में कह सकते हैं कि अगर ब्राह्मणों और ऊंची कही जाने वाली जातियों की वर्तमान पीढ़ी को उसका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे ब्राह्मणवाद की विरोधी हो जाएंगी।

मार्टिन लूथर किंग जहां काले लोगों के गोरों के साथ एकीकरण के हिमायती थे वहीं मैल्कम हर क्षेत्र में कालों की ‘अलग पहचान’ के हिमायती थे। काले लोगों में पैदा हुए मध्य वर्ग के वे मुखर आलोचक थे। उनके मुताबिक यही वर्ग गोरे लोगों के साथ एकीकरण के लिए लालायित रहता है, भले इसके लिए उसे अपनी आत्मा ही क्यों न बेचनी पड़े। इस संदर्भ में मैल्कम ने कहा कि जब आप मछली पकड़ने के लिए चारा डालते हैं तो मछलियों को लग सकता है कि आप उनके दोस्त हैं। लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि चारे के ऊपर एक हुक भी लगा है जो उन्हें अपने समुदाय से अलग करके उनकी जान ले लेगा। इस कथन को हम अपने देश की हकीकत से भी परख सकते हैं।

मैल्कम एक्स अपने अंतिम समय में काले लोगों की मुक्ति को दुनिया के तमाम शोषितों के साथ जोड़ कर देख सके। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की उनकी समझ लगभग वही थी जो उस समय के तमाम कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की थी। इसीलिए वे कालों और अन्य शोषित लोगों की मुक्ति को इस व्यवस्था में असंभव मानते थे। इस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के ध्वंस पर ही शोषितों की असली स्वतंत्रता कायम होनी है। मृत्यु के कुछ ही समय पहले मैल्कम एक्स ने कहा था कि आजादी की कीमत मृत्यु है।

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