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विपरीत ध्रुव

अनूप शुक्ला इस बार सिविल सेवा परीक्षा में चार लड़कियों के अव्वल आने की खबर के साथ-साथ उनके साक्षात्कार भी सुने। यह भी पता चला कि टॉपर इरा सिंघल 2010 में ही आइआरएस यानी भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुन ली गई थीं, लेकिन उनके विभाग ने नियुक्ति नहीं दी, क्योंकि वे शारीरिक रूप से […]

Author July 8, 2015 6:16 PM

अनूप शुक्ला

इस बार सिविल सेवा परीक्षा में चार लड़कियों के अव्वल आने की खबर के साथ-साथ उनके साक्षात्कार भी सुने। यह भी पता चला कि टॉपर इरा सिंघल 2010 में ही आइआरएस यानी भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुन ली गई थीं, लेकिन उनके विभाग ने नियुक्ति नहीं दी, क्योंकि वे शारीरिक रूप से अशक्त थीं। उनके पिता ने बताया कि वे विभाग के निर्णय के लिए ‘कैट’ गए, जिसने चार साल में इरा सिंघल के पक्ष में फैसला दिया। कैट के फैसले में कानूनी नुक्ते से ज्यादा सहज बुद्धि की भूमिका रही होगी।

इरा के विभाग के जिन लोगों ने उनको चार साल नियुक्ति के लिए इंतजार कराया, वे भी इसी सिविल सेवा से आए होंगे। लेकिन उन्होंने इरा को कैट की तरफ हांक दिया कि वे वहां से अपना हक लेकर आएं। यह सिविल सेवाओं में अधिकारियों के वरिष्ठ होने के साथ उनकी निर्णय-क्षमता में सहज बुद्धि के न्यूनतम होते इस्तेमाल का उदाहरण है। इरा के टॉप करने में भी शायद उन्हें चार साल तक नियुक्ति नहीं दिया जाना एक वजह रही कि इस बीच उन्होंने फिर से परीक्षा दी। देश के सबसे आला दिमाग वाले लोग वह निर्णय नहीं कर पाते हैं, जो उनसे कम जहीन माने जाने वाले लोग कर लेते हैं। न्यायिक सेवाओं में जाने वाले आमतौर पर सिविल सेवाओं में जाने में विफल रह गए लोग होते हैं।

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यह बहुत खुशी की बात है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाली परीक्षा में लड़कियां पहले चार स्थानों पर रहीं। खैर, उस दिन सुबह जब इरा और अन्य अव्वल आए प्रतिभागियों से बातचीत सुन रहा था, उसी समय घर के मुख्य दरवाजे पर दो बच्चियां और एक महिला आई और हमसे अहाते के घास के बारे में पूछा- अंकलजी, घास काट लें? मैंने कहा- ‘हां!’ अंदर आकर वे अपने जानवरों के लिए घास काटने लगीं।

एक बच्ची का नाम आयशा था। उसके बाएं पैर में र्इंट गिर जाने से चोट लग गई थी। कुछ दिन पट्टी बांधने के बाद उसने दवा बंद कर दी। हालांकि चोट अब भी ठीक नहीं हुई थी। बारह साल की इस बच्ची को पढ़ना-लिखना नहीं आता। स्कूल कुछ दिन गई थी, लेकिन फिर छोड़ना पड़ गया। पिता कबाड़ी का काम करते हैं। उसके तीन भाई हैं। वे अब भी स्कूल जाते हैंं, लेकिन बच्ची का स्कूल जाना बंद हो गया। महिला ने इसकी वजह बेहद गरीबी बताई।

कुछ देर बाद जब वे जाने लगीं तो मैंने बच्ची से कहा- ‘कम से कम कुछ पढ़ना-लिखना तो सीख लो! नाम ही लिखना सीखो! ‘अंकलजी यह अपना नाम लिख लेती है!’ साथ की बच्ची गुलुफ्ता ने बताया। मैंने कहा कि लिख कर दिखाओ तो आयशा ने जमीन साफ की, हाथ से नाम लिखने के इरादे से। लेकिन फिर संकोचवश नहीं लिखा। एक-दूसरे के सिर पर घास के गट््ठर लदवा कर वे चली गर्इं।

मैं बहुत देर तक देश के दो ध्रुवों जैसी स्थितियों पर खड़ी लड़कियों की स्थिति पर सोचता रहा। एक तरफ लड़कियां देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में अव्वल आ रही हैं, दूसरी तरफ ऐसी बच्चियां भी हैं, जिन्हें इतनी बुनियादी शिक्षा भी हासिल नहीं हो पाती कि अपना नाम लिख पाएं। पता नहीं कब यह अंतर कम होगा और देश के सारे बच्चे कम से कम बुनियादी तालीम हासिल कर सकेंगे। वह भी तब, जब सरकारें दिन पर दिन सस्ते सरकारी स्कूल बंद करती जा रही हैं। अभी के चलन से तो ‘सेल्फी विद डॉटर’ वाले परिवार और घास काटने वाली बच्ची के परिवार के बीच का अंतर बढ़ता ही दिख रहा है।

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