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कामयाबी बनाम चुनौती

अशोक कुमार

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम और फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ के प्रदर्शन का वक्त थोड़ा ही आगे-पीछे रहा। यह महज संयोग है कि एक प्रेरक फिल्म का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ, जब देश के प्रतिभावान नौजवान सिविल सेवा की परीक्षा में सफल होकर आला अधिकारी बनेंगे और विभिन्न क्षेत्रों में योगदान करेंगे। इस परीक्षा में सफल अभ्यर्थी न केवल अपने समाज, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत होते हैं। देश के अति प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता पाने में इन नौजवानों को किन-किन कठिनाइयों से जूझना पड़ता है, जीवन की उतार-चढ़ाव की बारीकियों को समझना पड़ता है और फिर सफलता मिलने पर जो खुशियां मिलती हैं, वह समझा जा सकता है। पिछले दो-ढाई दशक से सिविल सेवा के प्रति युवाओं में काफी दिलचस्पी बढ़ी है। युवाओं का यह उत्साह सराहनीय है।

लेकिन इसके साथ कई चिंताएं भी खड़ी हुई हैं। बढ़ता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी की समस्या, अराजकता का माहौल को लेकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति चिंतित हो सकता है। हर साल सैकड़ों नौजवान आइएएस और आइपीएस बनते हैं। इसके बाद पूरा देश उनकी कामयाबी को स्वीकार करता है और उनके जज्बे को सलाम करते हैं और अपने बच्चों को उनके जैसा ही अफसर बनाने का सपना देखते हैं। लेकिन कुछ दिनों बाद ही हम निराश होने लगते हैं। इसकी वजहें भी हैं। विद्यार्थी जीवन जैसा उत्साह आइएएस की तैयारी करने वाले के भीतर होती है, कामयाबी के बाद वही जज्बा नौजवान अधिकारी में नहीं रह जाता। वह भी उसी संस्कृति का मात्र एक हिस्सा बन जाता है जो आज तक चली आ रही थी। क्या यह नहीं लगता है कि सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों में देश को बदलने का जज्बा अब लगभग समाप्त हो गया है?

आज कोई नौजवान इस क्षेत्र को इसलिए चुनता है कि उसका समाज में रुतबा बढ़ जाए। उसकी गिनती भी आभिजात्य वर्गों में हो और उसके पास आधुनिक सुविधाओं से सजा एक संसार हो, जहां उसे किसी चीज की तकलीफ नहीं हो। फिर पद, पैसे और शक्ति के बल पर कानून को रोज तोड़ा जाए और अपने बचाव के लिए उन्हीं कानूनों को हथियार बना कर खुद को सुरक्षित रखा जाए। मैं यह नहीं कहता कि सभी ऐसे ही सोचते हैं। देश के कई वरिष्ठ अधिकारी हुए हैं जिन्होंने अपने दायित्व को निभाया ही नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी आम लोगों के नाम कर दिया। लेकिन मौजूदा परिस्थिति में ऐसे लोग केवल अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं और अपवाद के तौर पर ही देखे जाते हैं।

सिविल सेवा के लिए चयनित सभी प्रतिभागी देश के ऐसे विशिष्ट नौजवान हैं, जो सवा सौ करोड़ लोगों में सबसे बेहतर योग्यता रखते हैं। वे चाहें तो धारा को मोड़ दें या एक नई धारा ही बना लें। मैं समझता हूं कि अब समय आ गया है कि देश में जो भ्रष्ट अफसरों की फौज जमा हो रही है, उस पर नकेल कसने की जरूरत है। हमने पहले चल रही व्यवस्था को देख लिया। निराशा के सिवा कुछ नहीं मिला। अब इस ओर कुछ करने में नौजवान अधिकारी निश्चित ही सक्षम हैं। आज भ्रष्ट व्यवस्था से निपटना ही इन अधिकारियों के लिए गंभीर चुनौती है।

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