ताज़ा खबर
 

उम्मीद का आकाश

प्रफुल्ल कोलख्यान स्तब्धकारी असंतुलित बहुमत के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के अंदर घमासान जारी है। एक बड़ा खतरा तो यही हो गया कि ‘अराजनीतिक नागरिक जमात’ शासक दल में बदल गई और नागरिक जमात अपनी संभावनाओं के भंवर में छिन्न-भिन्न हो गई। इस समय मोटे तौर पर नागरिक जमात सन्नाटे में है। […]

Author March 24, 2015 8:41 AM

प्रफुल्ल कोलख्यान

स्तब्धकारी असंतुलित बहुमत के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के अंदर घमासान जारी है। एक बड़ा खतरा तो यही हो गया कि ‘अराजनीतिक नागरिक जमात’ शासक दल में बदल गई और नागरिक जमात अपनी संभावनाओं के भंवर में छिन्न-भिन्न हो गई। इस समय मोटे तौर पर नागरिक जमात सन्नाटे में है। अण्णा आंदोलन के दौरान आकार पाई नागरिक जमात के राजनीतिक दल में बदल जाने के कारण लगे झटके से अभी नागरिक जमात उबर नहीं पाई है। यह पहले भी हुआ है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चला भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष अपने मूल चरित्र में नागरिक जमात का ही संघर्ष था। धीरे-धीरे कांग्रेस जिस अनुपात में एक राजनीतिक दल में बदलती चली गई, उसी अनुपात में कांग्रेस में गांधीवादी राजनीति के लिए जगह कम होती चली गई। इस क्रम में गांधी कांग्रेस से बाहर हो गए और कांग्रेस गांधी-विचार के प्रभाव से बाहर। गांधी के मत और कार्यपद्धति से उस समय के महत्त्वपूर्ण लोगों का मतभेद था। इसके बावजूद न तो गांधी उन लोगों के लिए सर्वथा उपेक्षणीय बन गए और न गांधी के लिए वे लोग अन्यथा हो गए। गांधी की कार्यपद्धति से देर और दूर तक जुड़े लोग नागरिक जमात के रूप में सक्रिय रहे। उनकी अपनी स्वाभाविक कमियों के बावजूद गांधी की कार्यपद्धति से जुड़ी नागरिक जमात के अपने समय की राजनीतिक जमात से द्वंद्वात्मक रिश्ते की सकारात्मकता बची हुई थी।

यह भी सच है कि एक ओर कांग्रेस के कुछ बड़े लोग गांधी की कार्यपद्धति से जुड़ी नागरिक जमात को कांग्रेस से नत्थी मान कर चल रहे थे। दूसरी ओर, गांधी की कार्यपद्धति से जुड़ी नागरिक जमात के भी कई लोग अपनी इस नियति की करुण भविष्य लिपि को पढ़ रहे थे। आखिरकार कांग्रेस की नीतियां अपने से जुड़ी या अपने साथ विकसित नागरिक जमात को निष्प्रभ करती चली गर्इं। एक बार जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जो आंदोलन चला, वह अपने आंतरिक चरित्र में नागरिक जमात की ही अभिव्यक्ति था। लगातार हो रहे छोटे-छोटे सामाजिक आंदोलन अपने प्रारंभ में नागरिक जमात की आकांक्षा के रूप में ही विकसित होते हैं। हालांकि ये सामाजिक आंदोलन कदम-दो कदम चलते ही किसी न किसी संगठित राजनीतिक दल से जाने-अनजाने नत्थी हो जाते हैं। अपरिपक्व सामाजिक आंदोलन के संगठित राजनीतिक दल में बदल या उससे नत्थी हो जाने से नागरिक जमात को भारी धक्का लगता रहा है। नागरिक जमात के उभार का हमें थोड़ा-बहुत अनुभव है, लेकिन उसे राजनीतिक जमात में बदल जाने से रोकने का कोई अनुभव नहीं है।

विराजनीतिकरण की ओर बढ़ते समय में नागरिक जमात के सन्नाटे को तोड़ना बहुत जरूरी है। हालांकि अण्णा आंदोलन में उभरी नागरिक जमात के बाद राजनीतिक दल में बदल जाने से नागरिक जमात की विश्वसनीयता को बहाल करना काफी कठिन हो गया है। आने वाले दिनों में हमारी आंतरिक संरचना में नए किस्म के तनाव के उभार के साथ ही पुराने अंतर्विरोध की अति सक्रियता से भी परेशानी बढ़ने की गहरी आशंकाएं हैं। ये आशंकाएं हैं सांप्रदायिक, सामुदायिक, लैंगिक, आर्थिक, राजनीतिक बहिष्करण और असहिष्णुता। देश के विभिन्न संप्रदायों और समुदायों के बीच परस्पर अविश्वास बढ़ रहा है। इनके हितों के टकराव की स्थिति में सरकारों की संतुलनकारी भूमिका की जरूरत जितनी बढ़ रही है, उसी अनुपात में अपनी संतुलनकारी भूमिका से पीछे हटने या किसी एक के पक्ष में खड़े होकर असंतुलन बढ़ाने की प्रवृत्ति भी शासक वर्ग में बढ़ रही है। आतंकवाद का कारण, इतिहास, संस्कृति, जनता, जनतांत्रिक संस्थाएं वित्तीय जनतंत्र, वृद्धि और विकास, मानवाधिकारों से जुड़े व्यापक मामलों, पर्यावरण क्षरण, विस्थापन और पुनर्वास सहित कई प्रसंग हैं, जहां नागरिक जमात की बड़ी भूमिका है। सिर्फ चुनावी या सत्ता-संघटन की प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दे तक नागरिक जमात की भूमिका को सीमित मान लेना युक्तिसंगत नहीं है।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App