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उम्मीद की पटरी

संजीव शर्मा जनसैलाब शब्द भी उस दिन असम के सिलचर रेलवे स्टेशन में उमड़ी भीड़ के लिए छोटा प्रतीत होता है। ऐसा लग रहा था जैसे शहर की सारी सड़कें एक दिशा में मोड़ दी गई हों। बूढ़े, बच्चे, सजी-धजी महिलाएं और मोबाइल कैमरों से लैस नई पीढ़ी। पूरा शहर उमड़ आया था, बिना किसी […]

Author April 6, 2015 11:10 PM

संजीव शर्मा

जनसैलाब शब्द भी उस दिन असम के सिलचर रेलवे स्टेशन में उमड़ी भीड़ के लिए छोटा प्रतीत होता है। ऐसा लग रहा था जैसे शहर की सारी सड़कें एक दिशा में मोड़ दी गई हों। बूढ़े, बच्चे, सजी-धजी महिलाएं और मोबाइल कैमरों से लैस नई पीढ़ी। पूरा शहर उमड़ आया था, बिना किसी दबाव या लालच के अपने आप। मैंने अब तक अपने जीवन में कभी किसी रेल इंजन को देखने, उसे छूने, साथ में फोटो खिंचाने और उस पर चढ़ने की पुरजोर कसरत करते लोगों की इतनी भीड़ नहीं देखी।

दरअसल, जब इंतजार सारी हदें पार कर जाता है तो सब्र का बांध टूटने लगता है। फिर उम्मीद की छोटी-सी किरण भी उल्लास का कारण बन जाती है। कुछ ऐसा ही पूर्वोत्तर के दक्षिण असम के लोगों के साथ हुआ। बराक घाटी के नाम से विख्यात यह इलाका अब तक ‘लैंड लाक’ क्षेत्र माना जाता है। यानी जहां आना और फिर वहां से वापस लौटना एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने जैसा दुष्कर होता है। परिवहन सुविधाओं की कमी ने इस क्षेत्र को अलग-थलग कर दिया है। कुछ यही परेशानी बराक घाटी से सटे मिजोरम, मणिपुर और त्रिपुरा की थी। लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं। दो दशकों से इस घनघोर पहाड़ी इलाके में छोटी लाइन पर कछुए की गति से रेंगती मीटरगेज को ब्रॉडगेज में बदलने का अरमान पूरा हो चुका है।

परिवर्तन की आहट लेकर पहले खाली इंजन आया और अपनी गुर्राहट से लोगों को समय और गति के बदलाव का संकेत दे गया। फिर नौ डिब्बों की स्पेशल ट्रेन और उसमें सवार रेलवे के आला अधिकारियों ने भी सहमति दे दी। अब भारत की सबसे रोमांचक रेल यात्राओं में से एक सिलचर-लामडिंग रेलमार्ग पर भी सत्तर किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से ट्रेन दौड़ने लगेगी।

दिल्ली-आगरा जैसे रेलमार्ग पर करीब दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पटरियों पर उड़ान भरने और अमदाबाद-मुंबई मार्ग पर बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे लोगों के लिए सत्तर किलोमीटर की गति शायद खिलौना ट्रेन-सी लगे। लेकिन पूर्वोत्तर में अब तक छुक-छुक करती मीटरगेज पर घंटों का सफर दिनों में पूरा करने वाले लोगों के लिए तो यह रफ्तार किसी बुलेट ट्रेन से कम नहीं है। खासतौर पर जब महज दो सौ दस किलोमीटर की यह यात्रा इक्कीस सुरंगों और चार सौ से ज्यादा छोटे-बड़े पुलों से होकर करनी हो तो फिर इस रोमांच के आगे बुलेट ट्रेन की आंधी-तूफान-सी गति भी फीकी लगेगी।

इस मार्ग पर सबसे लंबी सुरंग तीन किलोमीटर से ज्यादा की है तो सबसे ऊंचा पुल लगभग एक सौ अस्सी फुट ऊंचा है। अट्ठाईस जाने-अनजाने स्टेशनों से गुजरती ट्रेन कई बार सात डिग्री तक घूम कर जाएगी। 1996-97 में तकरीबन छह सौ करोड़ के बजट में तैयार की गई यह राष्ट्रीय रेल परियोजना लगभग दो दशक बाद 2015 में पांच हजार करोड़ रुपए में मूर्त रूप ले पाई है। इस रेल मार्ग को हकीकत में तब्दील करना किसी मायने में प्रकृति की अनजानी विपदाओं से युद्ध लड़ने से कम नहीं था। कभी जमीन धंस जाती थी तो कभी चट्टान खिसक जाती थी। लेकिन लगभग सत्तर सहयोगियों की जान गंवाने के बाद भी मानव श्रम ने हार नहीं मानी और उसी का नतीजा है कि पूरे पूर्वोत्तर में उल्लास और उत्साह का माहौल है।

हम-आप सभी के लिए शायद महज यह रेल पटरियों का बदलना भर हो। लेकिन बराक घाटी और त्रिपुरा-मिजोरम के लाखों लोगों के लिए ये विकास की उड़ान के नए पंख हैं। प्रगति की बाट जोह रहे पूर्वोत्तर की नए सिरे से लिखी जा रही तकदीर है। जब नई बिछी ब्रॉडगेज रेल लाइन पर कुलांचे भरता हुआ इंजन यहां पहुंचा तो उसे टकटकी लगाए निहार रही तमाम आंखों में तृप्ति की ठंडक और भविष्य की उम्मीदों की चमक आ गई थी।

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