ताज़ा खबर
 

शब्दों का हिसाब-किताब

सुनील मिश्र उस रात जब नींद नहीं आ रही थी, मैं यही सोचता रहा कि कितनी ही किताबों के प्रूफ पढ़ चुकने के बाद भी बहुत-सी बातें मैं नहीं समझ पाया। जब नया-नया सीखा था, तब अक्सर गलतियां छूट जाती थीं। उन छूटी हुई गलतियों को मुझसे वरिष्ठ पकड़ लेते थे। अधिकतर तो मेरे साथ […]

Author April 1, 2015 11:10 PM

सुनील मिश्र

उस रात जब नींद नहीं आ रही थी, मैं यही सोचता रहा कि कितनी ही किताबों के प्रूफ पढ़ चुकने के बाद भी बहुत-सी बातें मैं नहीं समझ पाया। जब नया-नया सीखा था, तब अक्सर गलतियां छूट जाती थीं। उन छूटी हुई गलतियों को मुझसे वरिष्ठ पकड़ लेते थे। अधिकतर तो मेरे साथ यही हुआ कि जब-जब गलतियां चिह्नित हुर्इं, मुझे उन्होंने बताया कि इस सही शब्द का ज्ञान तुम्हें अब हो जाना चाहिए। मैं एक तरह से इसे अपने बच जाने का एक अवसर मानता था। लेकिन यह भी सोच लेता था कि अबकी बार यह शब्द उसी तरह जाएगा जैसा बताया गया है। अगर नहीं गया तो शायद लज्जित होना पड़ेगा। कुछ डर कह लीजिए या कुछ अपने लिए सबक भी कि मैं धीरे-धीरे उन गलतियों को सुधारता गया। तब मैं यह भी सोचता था कि जिस तरह जानकार लोग मेरी गलतियों पर पेंसिल रख कर सही का ज्ञान कराते हैं, जब मैं इन सब बातों को अच्छी तरह समझने लगूंगा और मुझे किसी की गलती जांचने का मौका मिलेगा तो मैं भी इसी तरह उन्हें चिह्नित करूंगा और जिससे गलती हुई होगी वह आगे चल कर उन्हें ठीक करने के अवसर पाए, इतनी उदारता रखूंगा।

एक समय बाद वह दौर भी आ गया। पढ़ा हुआ इस बात का सबूत होता था कि कोई भी प्रूफ की गलती नहीं है। लेकिन इधर यह भी देखने का बोध नहीं हुआ कि अपने कहे-बोले में कितने प्रूफ सुधार की गुंजाइश है! ऐसा लगता है कि जीवन में प्रूफ की गलतियां कभी भी हो जाती हैं। समय के साथ मैं यह उदारता बरत रहा हूं कि छपे हुए में प्रूफ की भूलों को देख कर कुछ नहीं कहता। एकाध बार इस तरह का उत्तर मिला कि मैंने देखा, तब सही था या सही तो लिखा था, पता नहीं कैसे हो गया? अबोध उत्तरों पर यही लगा कि व्यवहार में अब इसकी बहुत जरूरत नहीं रह गई है। प्रूफ की भूलों वाले छपे हुए का भी स्वागत किया जाना चाहिए।

अब ऐसा लगता है कि अपनी जिंदगी में सब लिखे-अधलिखे फलसफों के प्रूफ को ठीक से देखा जाना चाहिए। बहुत जल्दी होती है लिखने की… पन्नों को भरते रहने की और पता नहीं इसी में शब्दों का हिसाब-किताब गलत हो जाता है। जाहिर है, हिसाब-किताब शब्द का अर्थ गुणा-भाग जैसा नहीं है। पर फिर मन करता है कि पन्ने उलटने की कोशिश करूं। अब तक सारी आपाधापी पन्ने पलटने की रही है। मन करता है कि ठहर जाऊं और पन्ने लिखने के बजाय पन्ने उलट कर ध्यान से प्रूफ देखूं। व्यवहार और चलन दोनों के ही इस बदल चुके जमाने में उन सारी पटरियों को, जितना बन सके, दूर तक देख लेना चाहता हूं, जिनका मुड़ने के बाद पता नहीं चलता। मुझे मोड़ के बाद उस अदृश्य से घबराहट महसूस होती है!

रात गहराती है, भौंकते हुए कुत्ते अचानक रोने लगते हैं…! उनके रुदन पर न गुस्सा आता है और न डर लगता है। नींद में ही समझने की कोशिश करता हूं कि वे जरूर पीड़ा महसूस कर रहे होंगे, असह्य पीड़ा, जिसे बर्दाश्त न कर पाने के कारण वे रो रहे हैं!

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App