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विज्ञान बनाम चेतना

निशांत सिंह नारायण मूर्ति का हाल ही में आया बयान काफी हद तक ठीक है कि पिछले कई दशकों में भारत में कोई बड़ी वैज्ञानिक खोज नहीं हुई है। इसकी पड़ताल करें तो हम पाएंगे कि हमारी मूल चेतना ही अभी तक वैज्ञानिक नहीं हो पाई है। विज्ञान का सीधा संबंध तार्किकता, मौलिक चिंतन और […]

Author July 24, 2015 2:02 PM

निशांत सिंह

नारायण मूर्ति का हाल ही में आया बयान काफी हद तक ठीक है कि पिछले कई दशकों में भारत में कोई बड़ी वैज्ञानिक खोज नहीं हुई है। इसकी पड़ताल करें तो हम पाएंगे कि हमारी मूल चेतना ही अभी तक वैज्ञानिक नहीं हो पाई है। विज्ञान का सीधा संबंध तार्किकता, मौलिक चिंतन और तथ्यों से है। विज्ञान का अर्थ सिर्फ यह नहीं कि कुछ आविष्कार ही किए जाएं। वह विज्ञान का एक अंग मात्र है। विज्ञान का अर्थ यह भी है कि हम सिर्फ पूर्व स्थापित मान्यताओं के आधार पर ही चलना स्वीकार नहीं करते।

प्रसिद्ध दार्शनिक रेने डेकार्ट ने अपनी ‘कार्टेजियन पद्धति’ में कहा है कि अगर कुछ जानना है तो हमें संशय करना सीखना पड़ेगा। वे संशय को एक साध्य के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं और भारत के साथ यह दिक्कत हमेशा से रही कि उसने कुछ जानने के लिए संशय नहीं किया। समाज का बहुत बड़ा वर्ग सिर्फ चीजों को इसलिए सही मानता आया है कि उनके दादा-परदादाओं की ऐसी मान्यता थी और वही मान्यता वह आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करता रहता है।

आखिर क्या कारण है कि भारत में आइआइटी में दाखिले के लिए हर साल जद्दोजहद करने वाले विद्यार्थी कोई बड़ी वैज्ञानिक खोज करने में असफल रहे हैं? क्या वैज्ञानिक खोज के लिए किसी बड़े तकनीकी संस्थान का हिस्सा होना आवश्यक है? क्या शिक्षा व्यवस्था में ही दोष है कि हम बचपन से ही विज्ञान में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को इस दिशा में नहीं ढाल पाते? क्यों एक भी आइआइटी या अन्य प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान विश्व में अपना चिह्नित करने योग्य स्थान नहीं रखते? इन सबके पीछे कारण बेहद बुनियादी और सामान्य हैं।

वैज्ञानिक खोज के लिए स्वतंत्र चिंतन जरूरी है। विज्ञान चूंकि व्यावहारिक बदलाव लाने में सक्षम होता है, इसलिए आवश्यक है कि ये बदलाव पहले चेतना के स्तर पर आएं। एक स्वतंत्र व्यक्ति ही स्वतंत्र चिंतन कर सकता है। एक बच्चा सबसे अधिक स्वतंत्र होता है। वह आश्चर्य करता है, चीजों के पीछे के कारण को समझने की कोशिश करता है। यही वह समय है जब उसमें स्वतंत्र चिंतन की नींव डाली जाए। उसे रटी-रटाई बातें न बता कर एक निश्चित मार्गदर्शन देकर उसे छोड़ दिया जाए कि तुम खुद खोजो, निष्कर्ष निकालो। इससे उसमें कारण-कार्य संबंधों को समझने की क्षमता आएगी। वह चीजों को एक दूसरे से जोड़ सकेगा और अगर उसकी अभिरुचि जग गई तो वह निश्चित ही कुछ नया स्थापित करेगा।

किसी सेब को गिरते हुए देख कर न्यूटन और भाप से केतली के ढक्कन को गिरते हुए देख कर जेम्स वाट आश्चर्य करते हैं और वे इनके कारणों को तलाशते हुए नई अवधारणाओं को जन्म देते हैं। आश्चर्य करना और उस दिशा में निरंतर चिंतन ही नवीन खोजों को जन्म देते हैं और इसके लिए बड़े तकनीकी संस्थानों की अनिवार्यता नहीं है। दिक्कत यह है कि ये संस्थान भी सिर्फ सिद्धांतों को ही थोपने का काम कर रहे हैं। प्रायोगिक शिक्षा पर ज्यादा बल दिया जाए, बजाय अति सैद्धांतिक शिक्षा के और इसकी शुरुआत प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था से होनी चाहिए।

लेकिन अभी हमारी शिक्षा व्यवस्था में ही इतने दोष हैं कि ये सब सपने जैसा लगता है। विज्ञान ने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिवर्तन किए हैं, लेकिन उसकी वजह से चीजें आसान भी हुई हैं। इस बात में सच्चाई है कि विज्ञान के क्षेत्र में हम अभी आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं। महज मिसाइल परीक्षण और हाल ही में ब्रिटेन के उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने वाली उपलब्धियां हमारे रक्षा और अंतरिक्ष तंत्र में तो बढ़ोतरी कर सकती हैं, हमारे मानसिक और वैचारिक तंत्र में नहीं।

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