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अनुराग अन्वेषी देश में बलात्कार की कोई भी घटना जब सुर्खियों में आती है तो सबके भीतर एक खास तरह का डर छोड़ जाती है। ऐसी खबरों के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता और सुरक्षा-व्यवस्था को जम कर कोसता है। साथ ही वह ऐसी वारदात की कुछ आम वजहें भी तलाशता है। अक्सर सन्नाटा, […]

Author February 23, 2015 11:36 AM

अनुराग अन्वेषी

देश में बलात्कार की कोई भी घटना जब सुर्खियों में आती है तो सबके भीतर एक खास तरह का डर छोड़ जाती है। ऐसी खबरों के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता और सुरक्षा-व्यवस्था को जम कर कोसता है। साथ ही वह ऐसी वारदात की कुछ आम वजहें भी तलाशता है। अक्सर सन्नाटा, परिचित, रिश्तेदार की धोखेबाजी या फिर बदले की भावना वजह के रूप में दर्ज किए जाते हैं। अकेली क्यों गई थी… किसी को साथ क्यों नहीं ले गई… जैसे पता नहीं कितने सवाल नाचते रहते हैं, पर कोई सही जवाब नहीं मिल पाता। आखिरकार हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। दरअसल, भारतीय समाज में ये सवाल और चिंताएं महज तात्कालिक हैं।

हमारे समाज में मर्दों को परंपराओं से यह सीख मिलती रही है कि हर स्त्री पर किसी न किसी मर्द का अधिकार है। शादी से पहले स्त्री पिता के अधिकार क्षेत्र में होती है, शादी के बाद पति और फिर बेटे। इस सत्ता के मद में चूर भारतीय मर्द बलात्कार को इज्जत से जोड़ कर इसलिए भी देखता है कि उसे लगता है बलात्कार उसके अधिकार क्षेत्र में किसी दूसरे पुरुष द्वारा किया गया हमला है। यानी स्त्री की मानसिक पीड़ा को नजरअंदाज कर मर्द इस वारदात को अपनी प्रतिष्ठा पर किया गया हमला मानता है। तमाम सांप्रदायिक दंगों के दौरान दंगाइयों के निशाने पर आमतौर पर महिलाएं ही क्यों आती हैं?

दूसरी तरफ, इस समाज में स्त्री को बताया जाता है कि तेज दौड़ना, खिलखिलाकर हंसना या फिर पलट कर सवाल करना स्त्रियोचित नहीं होता। इन सारी नसीहतों को घुट्टी की तरह पीकर वह संकोच, दब्बूपन और कायरता के सांचे में ढलती हुई जीती-जागती मूर्ति बन जाती है। हमारा मर्दवादी समाज अपनी गढ़ी हुई इस मूर्ति पर सीना तान कर कहता है, देखो, उसमें लज्जा है, शील है, सहनशीलता है! स्त्री पर पुरुष का हक जैसी धारणाएं स्त्री को भयमुक्त होकर खुली हवा में जीने नहीं देतीं।

दुखद पहलू यह है कि साधारण लोगों के अलावा पढ़ा-लिखा तबका भी बलात्कार को पीड़िता की ‘इज्जत की लूट’ का नाम देता है। सवाल है कि ऐसी वारदात से पीड़िता की इज्जत कैसे चली जाती है। एक पुरुष के साथ जब कोई पुरुष ही यही अपराध करता है तो क्या पुरुष वर्चस्व वाला हमारा समाज उसे पीड़ित की इज्जत लुट जाने की तरह देखता है? विभिन्न सर्वेक्षणों के मुताबिक अधिकतर मामलों में पीड़िता के आसपास के लोग ही बलात्कारी होते हैं। स्त्री के संबंध में मर्दों का इतिहास सचमुच बहुत गंदा रहा है और यही समाज स्त्री से अपनी यौन पवित्रता को किसी भी कीमत पर बचाए रखने की अपेक्षा करता है। समाज का कोई घिनौना चरित्र किसी स्त्री को जब पूरी बस्ती में नंगा घुमाता है, तो क्या इस हादसे को पीड़िता की इज्जत से जोड़ कर देखा जाना चाहिए? या फिर यह उस बस्ती के मुर्दा होने का सबूत है?

सवाल यह भी है कि इस अपराध को रोकने के लिए किसी स्त्री से कितनी शारीरिक क्षति स्वीकार करने की अपेक्षा की जानी चाहिए? समाज उस स्त्री को प्रशंसा की निगाह से देखता है जो बलात्कार का विरोध करते हुए अपने हाथ-पांव या फिर जान गंवा देती है। दूसरी तरफ, इस वारदात की शिकार स्त्री के समूचे अस्तित्व को ‘अपवित्रता’ से जोड़ कर उसका जीवन मुश्किल बना दिया जाता है। समाज का यह नजरिया कितना सही है? दरअसल, यह सारी हाय-तौबा इसीलिए है कि हमारी इस कथित महान संस्कृति ने पुरुषों का वर्चस्व और कब्जा बनाए रखने के लिए स्त्री को एक जड़ और अंधेरे घेरे में कैद कर दिया है। जड़ता की यह स्थिति टूटनी चाहिए।

 

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