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न्याय की पहुंच

रचना पाटीदार महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में उन्हें न्याय नहीं मिल पाता, इस बात को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकार किया है। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने अपने एक फैसले में कहा है कि ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में […]

Author June 1, 2015 4:23 PM

रचना पाटीदार

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में उन्हें न्याय नहीं मिल पाता, इस बात को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकार किया है। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने अपने एक फैसले में कहा है कि ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में दोषियों को उनके अपराधों की गंभीरता और परिणाम के अनुसार सजा नहीं मिलती है। इसलिए अदालतों द्वारा सजा देने का मापदंड सख्त होना चाहिए।’ सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से निचली अदालतों की न्यायिक प्रक्रिया और उससे जुड़े तंत्र की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े होते हैं, जिसमें पुलिस अनुसंधान, लोक अभियोजन और चिकित्सकीय परीक्षण जैसे विभिन्न पहलू शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की इस चिंता ने पुलिस प्रशासन को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। हिंसा की दशा में महिलाओं को न्याय तक पहुंचने के लिए पुलिस थाने का पड़ाव पार करना पड़ता है जो सबसे ज्यादा मुश्किल होता है। इस पड़ाव पर कई बार उन्हें अपमान भी झेलना पड़ता है। इंदौर की कुछ पीड़ित महिलाओं से चर्चा करने पर भी यही बात सामने आई। यहां की एक बस्ती में रहने वाली विमला बाई ने बताया कि ‘पति द्वारा पिटाई करके घर से निकाल दिए जाने के बाद जब मैं पुलिस थाने पहुंची तो पुलिसकर्मियों का कहना था कि पति ने पिटाई कर दी तो क्या हुआ, इसकी भी कोई रिपोर्ट लिखी जाती है!’ इस प्रकार का नजरिया रखने वाली पुलिस से क्या कोई महिला न्याय की उम्मीद कर सकती है? यह दृष्टिकोण अपराध के अनुसंधान को भी प्रभावित करता है, जिससे कई बार आरोपी न्यायालय से दोषमुक्त हो जाता है। जाहिर है, पुलिस व्यवस्था में सुधार से लेकर उन्हें महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

कई बार तो महिला की एफआइआर दर्ज नहीं की जाती। अगर कहीं एफआइआर दर्ज हो भी जाती है तो मारपीट, गाली-गलौज, धमकी, छेड़छाड़ जैसे अपराधों को हस्तक्षेप के अयोग्य करार देकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कई संज्ञेय अपराधों में भी पुलिस द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पीड़ित को न्याय नहीं दिलवा पाती। हमारी न्याय प्रक्रिया में भी कई ऐसे पहलू हैं, जो महिला को इंसाफ से वंचित कर देते हैं। लोक अभियोजक की पीड़िता को न्याय दिलवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन आमतौर पर पीड़ित और लोक अभियोजक के बीच संवाद कम होता है और कई बार संवादहीनता की स्थिति होती है। कई बार तो पीड़िता को पता ही नहीं होता कि उसका वकील कौन है। अगर हम पूरे न्याय व्यवस्था के ढांचे को देखें तो पीड़ित की पैरवी के लिए जिला एवं सत्र न्यायालय में एक लोक अभियोजक और दो या तीन सहायक लोक अभियोजक ही होते हैं। जाहिर है, ये वहां सैकड़ों प्रकरणों के लिए अपर्याप्त हैं। जबकि आरोपी की पैरवी के लिए हजारों की तादाद में वकील होते हैं। इस दशा में अदालत में जितनी मजबूती से आरोपी का पक्ष रखा जाता है, उतनी मजबूती से पीड़िता का पक्ष प्रस्तुत नहीं हो पाता है।

मुकदमों का लंबे समय तक चलना भी न्याय मिलने में एक बड़ी बाधा है। न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने एक फैसले में कहा था कि ‘समय पर न्याय नहीं मिलना न्याय नहीं होने के समान है।’ वर्तमान में देश के विभिन्न न्यायालयों में करीब तीन करोड़ तेरह लाख मामले लंबित हैं। न्याय तक महिलाओं की पहुंच बनाने के लिए यह जरूरी है कि सरकार भी गंभीरता से कुछ कदम उठाए। इसमें पुलिस सुधार एक बड़ी आवश्यकता है। आमतौर पर पुलिस को तकनीकी प्रशिक्षण तो दे दिया जाता है, लेकिन महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने की कोई बात उनके प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है। जबकि इस विषय पर उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत है। इसी तरह, सरकार को लोक अभियोजकों की संख्या बढ़ाने और उन्हें महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए भी नीतियां बनानी होंगी।

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