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रंग भरे गीत

मुकुल श्रीवास्तव यों समय के साथ इस बदलती दुनिया में बहुत कुछ बदला है। लेकिन बदलते रंग के साथ होली अब भी कायम है। कुछ ऐसा ही है हमारी फिल्मों के साथ। दशक, दौर और लोग जरूर बदलते रहे, पर होली का उल्लास वैसा ही रहा। जब भी होली की बात होती है, कुछ फिल्मी […]

Author March 6, 2015 10:10 PM

मुकुल श्रीवास्तव

यों समय के साथ इस बदलती दुनिया में बहुत कुछ बदला है। लेकिन बदलते रंग के साथ होली अब भी कायम है। कुछ ऐसा ही है हमारी फिल्मों के साथ। दशक, दौर और लोग जरूर बदलते रहे, पर होली का उल्लास वैसा ही रहा। जब भी होली की बात होती है, कुछ फिल्मी गीत बरबस हमारी जबान पर आ जाते हैं और हम भी फिल्मी होली की मस्ती में शामिल हो जाते हैं। इस बार मैंने होली के कुछ फिल्मी गीतों को एक जगह रख कर इस त्योहार को याद करने की ठानी जो आज भी हमारे जेहन में जिंदा हैं। होली के जिक्र के साथ महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ की बात न चले, ऐसा नहीं हो सकता। सुनील दत्त, नरगिस, राजकुमार, हीरालाल और अन्य कलाकारों के साथ फिल्माया गया होली गीत ‘होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे जरा बांसुरी’। वी शांताराम की फिल्म ‘नवरंग’ में भी होली का एक शानदार गीत था- ‘जा रे नटखट ना खोल मेरा घूंघट पलट के दूंगी तुझे गाली रे, मोहे समझो ना तुम भोली भाली रे’। ‘कोहिनूर’ में दिलीप कुमार और मीना कुमारी ने जब ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो’ गाया तो लगा कि होली को एक नई अभिव्यक्ति मिली। इसी तरह, फिल्म ‘शोले’ का ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं’ जैसे सुहाने गाने आज भी सराहे जाते हैं।

यहां परदे पर होली के गीतों के जिक्र का मकसद सिर्फ इतना है कि इससे मुझे यह समझने में मदद मिली कि फिल्मों में किस भारतीय त्योहार को सबसे ज्यादा जगह मिली और उसके क्या परिप्रेक्ष्य रहे होंगे। जाहिर है, समाज जिन त्योहारों के रंगों में सबसे ज्यादा घुला-मिला होगा, फिल्में बनाने वाले लोग उसके जरिए लोगों की भागीदारी खोजने की कोशिश करेंगे। इस लिहाज से देखें तो फिल्मों में होली से संबंधित गीतों का यही महत्त्व है। इसकी सामाजिक अहमियत को समझते हुए ही शायद यशराज फिल्म्स ने भी तीन यादगार होली गीत दिए, मसलन, ‘सिलसिला’ में ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ और उसके बाद आई ‘मशाल’ में दिलीप कुमार गाते हैं- ‘यही दिन था यही मौसम जवां जब हमने खेली थी’, इसके बाद अनिल कपूर वाली पंक्ति है- ‘अरे क्या चक्कर है भाई देखो होली आई रे…।’ यशराज प्रोडक्शंस की तीसरी होली थी ‘डर’ की, जिसमें शाहरुख खान ढोल बजाते हुए होली समारोह में बिन बुलाए चले आते हैं। इस गाने के बोल हैं- ‘अंग से अंग लगाना पिया हमें ऐसे रंग लगाना’। यह गांव-देहातों में होली खेलते लोगों के सबके साथ घुलमिल जाने का रूपक है, भले कहानी में संदर्भ कुछ और हो।

‘बागबान’ का एक गीत ‘होली खेलें रघुबीरा अवध में होली खेलें रघुबीरा’ भी काफी लोकप्रिय हुआ। यह गीत इसलिए भी खास है कि इससे पहले के होली गीतों में कृष्ण या नंदलाल ही होली खेलते दिखाए-सुनाए गए थे। लेकिन शायद पहली बार अवध में राम को होली खेलते दिखाया गया। जब इस गीत पर अमिताभ बच्चन ने तान छेड़ी तो लगा कि वे ‘सिलसिला’ के होली गीत से आगे निकल गए हैं। शक्ति सामंत की फिल्म ‘कटी पतंग’ के गीत में किशोर कुमार गाते हैं- ‘आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली’ और इसी में लताजी की आवाज में जवाब है- ‘अपनी अपनी किस्मत देखो, कोई हंसे कोई रोए’ कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें खुशी के मौके पर पीड़ा को भी जगह मिली है। ‘नदिया के पार’ में जब सचिन ने ‘जोगी जी धीरे-धीरे’ गाया तो मानो पूरा देश उस तान में उनका साथ देने लग गया। अब इसे गानों में भरे गए रंग कहा जाए या रंग भरे गाने, तय करना मुश्किल है।

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