ताज़ा खबर
 

विरोध या वितंडा

रवि कुमार छवि जब भी शराब पीकर घर जाता तो पत्नी अक्सर डांटते हुए कहतीं कि ‘फिर पीके आए हो’ और मुझे अपनी हद में रहने की हिदायतें देती थीं! लेकिन हाल ही में मैं ‘पीके’ फिल्म देख कर घर पहुंचा और मैंने जब इस फिल्म के बारे में पत्नी को बताया तो उनकी खुशी […]

Author January 12, 2015 12:22 PM

रवि कुमार छवि

जब भी शराब पीकर घर जाता तो पत्नी अक्सर डांटते हुए कहतीं कि ‘फिर पीके आए हो’ और मुझे अपनी हद में रहने की हिदायतें देती थीं! लेकिन हाल ही में मैं ‘पीके’ फिल्म देख कर घर पहुंचा और मैंने जब इस फिल्म के बारे में पत्नी को बताया तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्हें सिनेमा की मुझसे अच्छी समझ है और उन्होंने काफी बातें कीं। मुझे लगा कि जब सब कुछ ठीक है, तब फिर इस फिल्म के विरोध में इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है! मैंने पिछले कुछ दिनों से ‘पीके’ फिल्म पर प्रकाशित कई लेख पढ़े। मुझे अंदाजा हो गया कि मामला क्या है। कुछ हिंदूवादी संगठन ‘पीके’ में भगवान का उपहास और धार्मिक भावना को भड़काने का आरोप लगा रहे हैं! सवाल यह है कि क्या हिंदू धर्म इतना कमजोर है कि किसी फिल्म में मनोरंजन की दृष्टि से दिखाए गए कुछ दृश्यों या संवादों के कारण वह खतरे में पड़ सकता है! यह तो वही बात हुई कि धर्म कोई इमारत है और उसे कुछ तोड़-फोड़ कर नुकसान पहुंचाया जा सकता है! दूसरे, हमारे देश में अब तक अदालतों को निष्पक्ष माना जाता है। तो फिर जिन हिंदू संगठनों को इस फिल्म से आपत्ति है, वे अदालत का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाते? अगर वे विरोध जताना चाहते हैं तो लोकतांत्रिक तरीके क्यों नहीं अपनाते? फिल्म के पोस्टर फाड़ने या अभिनेता और निर्देशक को अपशब्द कहने को किस तरह एक सभ्य हरकत माना जाएगा?

एक सवाल यह भी है कि जो लोग सिनेमा घरों में तोड़फोड़ करने जा रहे थे, अगर उस दौरान किसी सामान्य दर्शक को गंभीर चोट पहुंच गई होती तो उसका जिम्मेदार कौन होता! शायद इस सवाल का जवाब वे लोग नहीं देना चाहेंगे, क्योंकि उन्हें बिना ठोस आधार के सिर्फ हंगामा करना आता है। इसके अलावा, जो आमिर खान ‘मंगल पांडे’ और ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्मों के जरिए आम लोगों के दिलों में उतर जाते हैं और इन फिल्मों के लिए उन्हें देशप्रेमी कहा जाता है, वे ‘पीके’ जैसी फिल्म करने पर अचानक कैसे और क्यों ‘देशद्रोही’ के रूप में देखे जाने लगते हैं? फिर जब ‘पीके’ को लेकर इतना हंगामा हुआ तो इतने बड़े पैमाने पर लोगों ने क्यों सिनेमाघरों में जाकर इस फिल्म को देखा? क्यों इस फिल्म ने कमाई के नए रिकार्ड स्थापित किए? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो धर्म के ठेकेदारों या उन संगठनों को असहज कर सकते हैं, जिन्हें ‘पीके’ से असुविधा हो रही है।

इससे पहले उमेश शुक्ला के निर्देशन में बनी फिल्म ‘ओ माइ गॉड’ आई थी। वह फिल्म भी धर्म के आडंबरों पर कटाक्ष करती दिखी थी। लेकिन उस फिल्म पर हो-हल्ला इतना नहीं था। यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि इस फिल्म का विरोध करने वालों की राजनीति को इससे फायदा हुआ या नुकसान! ‘पीके’ फिल्म कहीं से किसी धर्म को कमतर नहीं बताती और न ही किसी धर्म का अपमान करती है। हां, यह जरूर है कि फिल्म कटाक्ष करके धर्म के उन ठेकेदारों या बाबाओं पर तंज कसती है जो लोगों को धर्म का भय दिखा कर उन्हें लूटते हैं।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X