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विद्वेष की राजनीति

अमिताभ गुंजन ऐसा माना जाता है कि भारत अनेकता की संस्कृति वाला देश है। लेकिन फिलहाल शायद यह बिखरने के कगार पर पहुंचता जा रहा है। यहां राजनीतिक फायदे के लिए धर्म के ठेकेदारों के द्वारा समाज में तमाम तरह के नए बवाल खड़े किए जाते रहे हैं। ऐसा लगता है कि वोटों की राजनीति […]

Author January 7, 2015 11:49 am

अमिताभ गुंजन

ऐसा माना जाता है कि भारत अनेकता की संस्कृति वाला देश है। लेकिन फिलहाल शायद यह बिखरने के कगार पर पहुंचता जा रहा है। यहां राजनीतिक फायदे के लिए धर्म के ठेकेदारों के द्वारा समाज में तमाम तरह के नए बवाल खड़े किए जाते रहे हैं। ऐसा लगता है कि वोटों की राजनीति के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाना राजनीतिक दलों की नियति बन चुकी है। पहले राजनीतिक वंशवाद के मुद्दे पर जम कर बवाल काटा गया। लेकिन समय बदलते और अपनी सत्ता आते ही ये मुद्दे गायब हो गए और आजकल जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे विषयों को मुद्दा बना कर सत्ता का लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है।

कुछ नेताओं की बयानबाजी से ऐसा लगता है, मानो वे अपने आप को विश्वविख्यात बनाना चाह रहे हैं। समाज में विकास की अवधारणा का मुद्दा खो गया लगता है। भारत में बढ़ती गरीबी जैसे कई मुद्दों को चुनावी एजेंडे में शामिल किया जा सकता है, जिससे देश के विकास को गति मिल सकती है। लेकिन नहीं! इन मुद्दों को शामिल न कर एक दूसरे की बुराई करना और लोगों के बीच धर्म के नाम पर घृणा फैलाना नेताओं के लिए आम बन चुका है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी भावनाएं आहत हो रही हैं। सवाल है कि अपनी राजनीति की चक्की में आम जनता को पीसना कितना सही है।

अखबारों की सुर्खियों में आने के लिए ऊल-जलूल बयान देना उचित नहीं है। ऐसी हरकतें आखिरकार देश की एकता और अखंडता में बाधक साबित होती हैं। हालत यह है कि आरोप-प्रत्यारोप लगाने की आड़ में पार्टियां एक दूसरे की निजी जिंदगी में दखलंदाजी से भी नहीं चूक रही हैं। यह इस देश की राजनीति के लिए उचित नहीं है। राजनीति में बयानबाजी का एक दायरा बनाना बहुत जरूरी है। इसे नजरअंदाज करना देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। लेकिन सियासत की दांव-पेच में पार्टियां यह भूल गई हैं कि राजनीतिक मुद्दों की क्या अहमियत है। हालांकि उनकी सियासत का शिकार बनने की हालत केवल किसी अनपढ़ व्यक्ति की नहीं है। पढ़े-लिखे लोगों के गंदे बयान से लोगों को शर्मसार होना पड़ रहा है। नेताओं को सिर्फ पार्टी या अपने हितों की फिक्र होती है। समाज और देशहित में कोई बयान देना उन्हें शायद अच्छा नहीं लग रहा है। अगर भारत में दो प्रमुख पार्टियों के चुनावी एजेंडे पर गौर किया जाए तो शायद किसी का एजेंडा ऐसा नहीं है, जिससे देश के गरीबों को कुछ राहत हो, उन्हें उनका हक मिले। वे सिर्फ धर्म और संप्रदाय को ध्यान में रखते हुए बनाए जा रहे हैं। अगर भाजपा हिंदुत्व को मुद्दा बनाती है तो वहीं कांग्रेस खुद को सेक्युलर पार्टी के रूप में साबित करना चाहती है।

यह सोचने वाला विषय है कि आखिर भारत जैसे विकासशील देश में सबसे अधिक किस मुद्दे की जरूरत है। आखिर धर्म और संप्रदाय से देश के गरीबों का कोई भला नहीं होने वाला है। अगर देश के लोगों को जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर बांट दिया जाए तो क्या इससे देश का विकास संभव है? भारत युवाओं का देश माना जाता है। अगर इसी तरह की राजनीति होती रही तो कई तरह के बवाल खड़े होंगे, जो देश के लिए घातक परिणाम पैदा कर सकते हैं। सही मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है, न कि विद्वेष बढ़ाने वाले मुद्दे उछाले जाएं जिनसे देश गर्त की ओर जा सकता है।

 

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