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पढ़ाई का परिवेश

ज्योति सिडाना कुछ शैक्षणिक कार्यों के लिए पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ। उस दौरान कुछ मित्रों की सलाह पर उनके साथ मैंने जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का भी भ्रमण किया। साफ परिवेश और चारों ओर हरियाली, साफ-सुथरी सड़कें और अनेक छोटी-मोटी चाय की दुकानों पर अकादमिक विमर्श में संलग्न विद्यार्थी जेएनयू की जीवंत संस्कृति […]

Author March 28, 2015 11:15 PM

ज्योति सिडाना

कुछ शैक्षणिक कार्यों के लिए पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ। उस दौरान कुछ मित्रों की सलाह पर उनके साथ मैंने जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का भी भ्रमण किया। साफ परिवेश और चारों ओर हरियाली, साफ-सुथरी सड़कें और अनेक छोटी-मोटी चाय की दुकानों पर अकादमिक विमर्श में संलग्न विद्यार्थी जेएनयू की जीवंत संस्कृति के परिचायक हैं। यह भी जाना कि विश्वविद्यालय की जमीन के एक बड़े भाग में विभिन्न संस्थान हैं, जिनका जेएनयू से कोई संबंध नहीं है और इसकी संस्कृति से इनकी संबद्धता भी नहीं है। हालांकि वह जमीन विश्वविद्यालय को अकादमिक गतिविधियों के विस्तार के लिए दी गई थी। खैर, जेएनयू के पुस्तकालय के पास हर किस्म के विद्यार्थियों का अंदर और बाहर जमघट था। बताया गया कि परीक्षा के दिनों में यह लाइब्रेरी चौबीसों घंटे खुलती है और इसमें अनेक दुलर्भ पुस्तकें हैं।

परिसर में विभिन्न विद्यार्थी संगठनों के वैचारिक उत्तेजना पैदा करने वाले बड़े-बड़े पोस्टर लगे हुए थे, लेकिन वे दीवारों को खराब नहीं कर रहे थे। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर विद्यार्थियों की त्वरित टिप्पणी उनके आलोचनात्मक विश्लेषण और उन मुद्दों पर गोष्ठियों के आयोजन यह बताने में सक्षम थे कि ‘विचारधाराओं के अंत’ की बात कम से कम जेएनयू के लिए मिथ्या है। परिसर की दीवारों पर निराला, पाश, विवेकानंद, गांधी, मार्क्स, माओ, दयानंद सभी के विचार जीवित हैं। सहमति और असहमति के द्वंद्व जेएनयू की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शायद इस कारण परिसर में खुली पुस्तकों की दुकानें विद्यार्थियों से भरी रहती हैं। हर विचार की पत्र-पत्रिका और विभिन्न विषयों के ताजा प्रकाशन वहां उपलब्ध हैं।

मैं जब अपने मित्रों के साथ चाय पीने के लिए एक थड़ी नुमा दुकान पर रुकी तो अचानक जयपुर का एक परिचित विद्यार्थी वहां आया और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समाजशास्त्रीय पक्षों पर उसने चर्चा प्रारंभ की, जो उसके शोध के विषय से संबद्ध थी। इस बीच एक पुस्तक विक्रेता वहां आया और उसने मेरे सहयोगी से पूछा कि सर, क्या आप मेरी दुकान पर कुछ छोड़ कर आए हैं? अचानक मेरे सहयोगी को ध्यान आया कि कुछ पत्रिकाएं खरीदते समय अपना कीमती मोबाइल वे वहीं छोड़ आए थे। जेएनयू की संस्कृति में यह ईमानदारी उस वैचारिक विविधता की देन है, जो एक-दूसरे के व्यक्तित्व को स्पष्ट रूप से समझने में सहायक है। उस दुकान पर पास में बैठे छात्र-छात्राएं धर्म, विज्ञान और राजनीति के अंतर्संबंधों पर एक सशक्त बहस कर रहे थे। एक आवाज ऐसी आ रही थी, जिसमें आइंस्टीन के नाम की चर्चा हो रही थी।

इस माहौल की अपेक्षा मैं राजस्थान में भी कर रही हूं। लेकिन विडंबना है कि ऐसा कुछ भी राजस्थान विश्वविद्यालय में फिलहाल नहीं दिखता है। अफसोसजनक यह भी है कि जेएनयू से आए प्राध्यापक जेएनयू का नाम केवल अपनी स्थापना के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन वहां के अकादमिक परिवेश की विविधतामूलक संस्कृति की किसी भी विशेषता का यहां प्रतिनिधित्व नहीं करते। शायद जेएनयू में वास्तविक परिवेश के अंदर कहीं कोई आभासी परिवेश भी है, जिसे मेरी आंखें उस परिसर में नहीं देख सकीं, पर जिसका अहसास राजस्थान विश्वविद्यालय में होता है। क्या राजस्थान विश्वविद्यालय या फिर देश के अन्य विश्वविद्यालयों के परिसर में वह अकादमिक संस्कृति उत्पन्न होगी, जिसका प्रतिनिधित्व जेएनयू करता है? यह सवाल शिक्षक-विद्यार्थी, अभिभावक और राजनेताओं की चेतना में उठना चाहिए। पर अब तक ऐसा हुआ नहीं है। इसके लिए जिम्मेवार कौन है? यह सवाल राजस्थान विश्वविद्यालय में पढ़ने का इच्छुक विद्यार्थी पूछना चाहता है। मगर इसका जवाब कहां से आएगा? हम सबके पास इसका क्या हल है!

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