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नीति का पाखंड

आतिफ़ रब्बानी अर्थनीति से संबंधित किस्सों-कहानियों में यह मशहूर है कि एक बार मार्गरेट थैचर ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों और सहयोगियों को मिल्टन फ्रीडमैन की एक किताब दी और उसे पढ़ने को कहा। उस किताब में एक बुनियादी सबक था- मौद्रिकवाद यानी मोनेटरिज्म का सबक। फ्रीडमैन के सिद्धांत पर थैचर मंत्रिमंडल ने अमल किया […]

Author May 30, 2015 4:32 PM

आतिफ़ रब्बानी

अर्थनीति से संबंधित किस्सों-कहानियों में यह मशहूर है कि एक बार मार्गरेट थैचर ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों और सहयोगियों को मिल्टन फ्रीडमैन की एक किताब दी और उसे पढ़ने को कहा। उस किताब में एक बुनियादी सबक था- मौद्रिकवाद यानी मोनेटरिज्म का सबक। फ्रीडमैन के सिद्धांत पर थैचर मंत्रिमंडल ने अमल किया हो या नहीं, लेकिन मुल्क की मौजूदा मोदी सरकार पिछले एक साल के कार्यकाल में इस सिद्धांत का अक्षरश: पालन करती हुई दिखती है। मिल्टन फ्रीडमैन मौद्रिकवाद के मुख्य प्रणेता रहे हैं।

दरअसल, मौद्रिकवाद वह वैचारिकी है जो मानती है कि किसी भी अर्थव्यवस्था में दीर्घावधि में होने वाली धन-आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियों के बीच गहरा संबंध है। आर्थिक संवृद्धि के लिए धनापूर्ति उत्तरदायी है। अब चूंकि धनापूर्ति, धन के परिसंचरण और फैलाव की रफ्तार का काम देश के केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक के जिम्मे है, इसलिए आर्थिक संवृद्धि में सरकार की भूमिका गौण हो जाती है। यानी सरकार को अपनी भूमिका महज नियामक और समन्वयक तक सीमित रखनी चाहिए। मोदी सरकार इस प्रयास को पूरी शिद्दत के साथ तेजी से अंजाम दे रही है।

गौरतलब है कि मौद्रिकवाद न तो आय के वितरण पर ध्यान देता और न ‘प्रभावी मांग’ की ओर। इसके बरक्स सरकारें राजकोषीय नीतियों का प्रयोग करके अर्थव्यवस्था में प्रभावी मांग पैदा कर सकती हैं और आर्थिक मंदी के भंवर से निकाल सकती हैं, ऐसा जॉन मेयनार्ड कीन्स का मानना था। राजकोषीय नीति का मतलब है सरकार अपने खजाने से क्या और कैसे खर्च करना चाहती है। जाहिर है, सरकार इन खर्चों को या तो अपने राजस्व या टैक्स से पूरा करती है या उधार लेती है। इसी नीति के आधार पर तय किया जाता है कि कम टैक्स लगा कर उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया जाए या टैक्स का दायरा बढ़ा कर लोकोपकारी परियोजनाएं चलाई जाएं, जिससे आमदनी का समतामूलक पुनर्वितरण किया जा सके।

मोदी सरकार ‘मेक इन इंडिया’ अभियान जारी रखे हुए है। यह अभियान बुनियादी तौर पर निर्यात-आधारित है। विश्व अर्थव्यवस्था में गहराती मंदी के भी संकेत मिल रहे हैं। चीन की विकास दर दस प्रतिशत से घट कर सात प्रतिशत पर आ गई है। जापान लंबे समय से मंदी की चपेट में है। ऐसे परिदृश्य में घरेलू मांग को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। राजकोषीय उपायों से ‘प्रभावी मांग’ पैदा करने की आवश्यकता है। जबकि सरकार कोई ठोस कदम उठाने के बजाय अपने पैर पीछे खींच रही है। पिछले वर्ष सरकार का सारा ध्यान राजकोषीय घाटे को कम करने में ही रहा।

सरकार ने अपने बजट में व्यापक कटौती की। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में यह कटौती 16.54 प्रतिशत तक है। मनरेगा के आर्थिक और सामाजिक फायदे को विश्व बैंक ने भी स्वीकार किया है। इसके बहुआयामी विकास योगदान देखते हुए इसने 2014 की वैश्विक विकास रिपोर्ट में इसे ग्रामीण विकास की ‘दरख़्शां मिसाल’ (स्टेलर एक्जांपल आॅफ रूरल डेवलपमेंट) की संज्ञा दी। लेकिन मौजूदा सरकार मनरेगा के दायरे को भी सिकोड़ रही है। इतना ही नहीं, ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं में भी दस प्रतिशत तक की कटौती की गई है। जाहिर है, अगर इन सामाजिक क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश किया जाता तो इसका बहुआयामी फायदा होता।

विचित्र है कि इस कटौती को मोदी सरकार ‘अच्छा प्रदर्शन’ बताती है। सरकार ने 2014-15 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के चार फीसद पर सीमित रखने में कामयाबी हासिल की है। इसे वित्त मंत्रालय ‘राजकोषीय मजबूती के प्रति प्रतिबद्धता’ और ‘बुद्धिमतापूर्ण नीतियों’ का नतीजा बता रहा है। एक तरफ राजकोषीय घाटा कम करने की बात कही जा रही है तो दूसरी ओर कॉपोरेट जगत को खुले हाथों से टैक्स में राहत दी जा रही है। यह नीति का पाखंड नहीं तो और क्या है?

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