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लूट के दिन

बिपिन बिहारी दुबे सन 1894 में ब्रिटिश सरकार के द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून लागू किया गया। इसे लागू करने का एकमात्र उद्देश्य ब्रिटिश कंपनियों को लाभ पहुंचाना था, भारतीय किसानों का हित नहीं। 1947 में भारत आजाद हुआ तो किसानों को इस कानून से मुक्ति की एक उम्मीद की किरण दिखी। आजादी के छियासठ साल […]

बिपिन बिहारी दुबे

सन 1894 में ब्रिटिश सरकार के द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून लागू किया गया। इसे लागू करने का एकमात्र उद्देश्य ब्रिटिश कंपनियों को लाभ पहुंचाना था, भारतीय किसानों का हित नहीं। 1947 में भारत आजाद हुआ तो किसानों को इस कानून से मुक्ति की एक उम्मीद की किरण दिखी। आजादी के छियासठ साल बाद कई सामाजिक संगठनों और किसानों के अथक प्रयास के बाद 2013 में कानून संशोधित हुआ और कुछ हद तक किसानों के हित में लागू हुआ। 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ, अध्यादेश के जरिए भूमि अधिग्रहण कानून फिर बदला गया और हम वापस 1894 की उसी स्थिति में पहुंच गए। इस बीच भट्टा परसौल, नंदीग्राम, सिंगूर आदि कई जगहों पर किसानों की जमीन हड़पने की कोशिश हुई, टकराव हुआ और जान-माल का नुकसान भी। 2013 में उस समय की यूपीए सरकार ने ‘उचित मुआवजा, भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार अधिनियम, 2013’ के जरिए भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों के हितों का थोड़ा खयाल रखा। हालांकि इस कानून को संपूर्ण न मान कर

कई सामाजिक संगठनों ने इसमें और सुधार की मांग की। वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष और तब इस कानून निर्माता समिति की अध्यक्ष रहीं सुमित्रा महाजन ने भी कहा था कि ‘यह कानून भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों के हितों की रक्षा करने वाला सर्वश्रेष्ठ कानून तो नहीं, पर उस दिशा में एक सार्थक प्रयास जरूर है।’

2014 में अच्छे दिनों के नारों पर सवार होकर आई मोदी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए उन सभी प्रयासों पर पानी फेर दिया, जिनकी बदौलत किसानों को कुछ लाभ मिलने की आस जगी थी। 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में सरकारी और गैर-सरकारी उपयोग के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए क्रमश: उस क्षेत्र के सत्तर और अस्सी फीसद किसानों से सहमति लेने का प्रावधान था, जो 2014 के अध्यादेश के द्वारा हटा दिया गया है। इस अध्यादेश के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण आधारिक संरचना, जन-आवासीय परियोजना, औद्योगिक कॉरिडोर और सामाजिक आधारिक संरचना के लिए किसी भी जमीन को अधिग्रहीत किया जा सकता है। जबकि 2013 के कानून में बहुफसली जमीन का अधिग्रहण किसी भी हालत में नहीं हो सकता था, किसी भी अधिग्रहण से पहले वहां के पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाना आवश्यक था। ग्रामीण किसानों को बाजार मूल्य का चार गुणा और शहरी किसानों को बाजार मूल्य का दो गुणा मुआवजा देने का प्रावधान भी 2013 के कानून में था। इसके अलावा अगर जमीन अधिग्रहीत होने के पांच साल के अंदर उसका उपयोग नहीं होता तो उसे वापस किसानों को दिया जाना था। 2014 में राजग सरकार के मंत्रिमंडल द्वारा पारित अध्यादेश के जरिए किसानों के हित से संबंधित सभी प्रावधानों को हटा दिया गया है।

एक ऐसा कानून जो पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ से सराहा गया हो, उसे अध्यादेश जैसी अलोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा बदल देना मोदी सरकार को शक के कठघरे में खड़ी करता है। हाल ही में दिल्ली में कुछ सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इस अध्यादेश को कानून न बनने देने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की और इसके खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक अपनी आवाज बुलंद करने का आह्वान भी किया। लेकिन इस बीच सरकार भी संसद का संयुक्त सत्र बुला कर इस अध्यादेश को कानून बनाने की जुगत में लगी है। राज्यसभा में अल्पमत में होने के कारण दोनों सदनों में इस कानून को पास कराना सरकार के लिए संभव नहीं है। अब यह भारत की जनता को तय करना है कि वह सरकार की इन जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सड़क पर आए या तथाकथित अच्छे दिन की खुमारी में मौन व्रत धारण कर जनविरोधी नीतियों का मूक समर्थन करे।

 

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