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लाचार किसान

अमिताभ गुंजन भारत गांवों का देश है, यह कहना बहुत आसान लगता है। लेकिन आज एक आदर्श स्थिति में इसी वाक्य को ग्रहण करना थोड़ा मुश्किल लगता है। भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। वहीं मेहनत कर फसल को उगाने वाले किसानों की एक बड़ी तादाद आत्महत्या करने को विवश है। लेकिन […]

Author March 14, 2015 7:55 AM

अमिताभ गुंजन

भारत गांवों का देश है, यह कहना बहुत आसान लगता है। लेकिन आज एक आदर्श स्थिति में इसी वाक्य को ग्रहण करना थोड़ा मुश्किल लगता है। भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। वहीं मेहनत कर फसल को उगाने वाले किसानों की एक बड़ी तादाद आत्महत्या करने को विवश है। लेकिन सालों से लगातार गहराती इस समस्या की गंभीरता को समझने की कोशिश नहीं हो रही है। किसानों के लिए बनाए जाने वाले हर नियम उनके खिलाफ होते जा रहे हैं। उपजाऊ भूमि पर एक नई मार सरकार द्वारा अधिग्रहण कानून की पड़ने वाली है। बहुफसली खेतों को भी औद्योगिक स्वरूप प्रदान किया जाने लगा है। जमीन अधिग्रहण की नई नीति अगर अमल में आती है तो कृषि योग्य भूमि का भी अधिग्रहण बहुत आसानी से किया जा सकता है। लुटना आखिर किसान को ही है।

उधर किसान भी कृषि कार्य करने में आ रही समस्याओं से निपटने को लेकर उदासीन हो रहे हैं। ऐसा लगता है, मानो उनका खेती से मोहभंग हो गया है। कृषिगत कार्यों‘ में खाद, बीज, सिंचाई जैसी समस्याएं आने के कारण किसान त्रस्त हो चुके हैं। फसलों के नुकसान के बाद या तो वे लाचार हो जाते हैं या फिर मुआवजे की राशि मिलने में भी उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं खेती की हालत में सुधार करने के दावे के साथ सरकार तमाम तरह की योजनाएं चलाती है। लेकिन ऋण की उपलब्धता से लेकर दूसरी सभी सरकारी कवायदों की असलियत जमीन पर क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऋण के बोझ से मरते किसानों की हालत ऐसी हो रही है, कि समूचे कृषि कार्य को निचले स्तर का कार्य माना जाने लगा है। ग्रामीण मामलों पर काम करने वाले जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ का कहना है किसानों का नाता कृषि से टूट चुका है और वही किसान आज शहरों में मजदूरी करने पर विवश हो गया है।

यों किसानों की आत्महत्या की कई वजहें हैं। खाद और बीजों के ऊंचे दाम, फसलों के सही दाम नहीं मिलने या बिचौलिए के ज्यादा पैसे खा जाने की वजह से कई बार किसानों के पास कर्ज लेने के सिवा कोई और चारा नहीं होता। इसके बाद मौसम पर निर्भरता एक सबसे बड़ी समस्या के रूप में आज भी किसानों को लाचार कर देती है। सूखा या फिर अतिवृष्टि की वजह से फसलों की बर्बादी की समस्या का कोई समाधान नहीं है और इसका मुआवजा लेना कितना मुश्किल है, यह कोई भुक्तभोगी किसान ही ज्यादा जानता है। इसके बाद कर्ज में डूबे किसान के पास आत्महत्या को छोड़ कर दूसरा विकल्प नहीं बचता। यह बेवजह नहीं है कि आज बहुत सारे किसान या तो कृषि को अपना पेशा नहीं बनाना चाह रहे या फिर खेती छोड़ रहे हैं। जाहिर है, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि की यह तस्वीर काफी चिंता का विषय है। कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। ऐसे में देश के अन्नदाताओं के सामने आत्महत्या करने के हालात आखिर क्यों पैदा हो रहे हैं। सवाल है कि एक किसान के इस हालत तक पहुंचने के लिए कौन जिम्मेदार है? आज किसानों के लिए कुछ खास नीतियां बनाने की जरूरत है, ताकि खेती बच सके और इस तरह किसान और फिर देश का जीवन बच सके।

 

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