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कोहरे में सफर

वर्षा मौत का सफर कैसा होता होगा! एक ऐसा सफर जो शुरू तो हुआ, मगर कोई अंत नहीं। जिसकी कोई दिशा नहीं, जहां कोई चौराहा या लालबत्ती नहीं आती, कहीं पहुंचना नहीं होता, कोई दृश्य नहीं होता, कोई मंजिल नहीं दिखती। बस सफर होता है। यह तो कोरी कल्पना है। लेकिन कोहरे में अगर आप […]

वर्षा

मौत का सफर कैसा होता होगा! एक ऐसा सफर जो शुरू तो हुआ, मगर कोई अंत नहीं। जिसकी कोई दिशा नहीं, जहां कोई चौराहा या लालबत्ती नहीं आती, कहीं पहुंचना नहीं होता, कोई दृश्य नहीं होता, कोई मंजिल नहीं दिखती। बस सफर होता है। यह तो कोरी कल्पना है। लेकिन कोहरे में अगर आप सफर कर रहे हों तो यह सच्चाई है। कोहरे का सफर मौत के सफर सरीखा लगता है। कोई आदि नहीं, कोई अंत नहीं। डरे, ठिठके, सावधान, असमंजस, खौफनाक खयाल…!

दफ्तर का सफर तय करने के लिए सर्दियों की सुबह के कोई पौने छह बजे घर से निकली थी। घर का दरवाजा खोला तो हर दृश्य को ढांपता बस कोहरा दिखा। सड़क पर सफेद बादल उड़ रहे हों जैसे। लग रहा था, जैसे मौसम को एनेस्थिसिया का इंजेक्शन दे दिया गया हो और बेहोशी चढ़ रही हो। इस समय में किसी दूसरी गाड़ी का दिख जाना हिम्मत बंधाने जैसा था। नेशनल हाईवे- 24 बस हादसों की ही याद दिलाता है। दूसरी तरफ कोई रोशनी नहीं दिख रही थी तो जान पर खेल कर चढ़ आए घुप्प अंधेरे में डूबे हाईवे पर। डिवाइडर की काली-सफेद पट्टियां ही दिख पा रही थीं और उन्हीं के सहारे आगे बढ़ रही थी। सड़क के ऊपर ओझल-सी पीली रोशनी से पता चला कि चौराहा आ गया है और अब यहां से बाएं मुड़ जाना है। उत्तर प्रदेश की आर्थिक राजधानी नोएडा की स्ट्रीट लाइटें इस जानलेवा मौसम में भी बंद पड़ी थीं।

वह व्यक्ति जिसने कभी रोशनी देखी न हो, वह इस दुनिया में किस तरह चलता होगा। आवाजों की तीव्रता, ध्वनि के उतार-चढ़ाव से अपने रास्ते तय करता होगा। कुछ न दिख पाने की सूरत में उन लोगों के बारे में सोच रही थी। धीमी गति से आगे बढ़ते हुए खयाल बड़ी तेजी से आ रहे थे। घर में छोड़ कर आई छोटी बच्ची… जिंदगी के लिए नौकरी, नौकरी का संकट, भविष्य का संकट, निरुद्देश्य होने का संकट…! सड़क पर संकट, संकट से बच निकलने की चतुराई। इन सड़कों पर कोई भी लम्हा मौत की दस्तक हो सकता है। यहां से सुरक्षित अपने ठिकानों तक पहुंच जाना ही हर रोज की बड़ी बात हो जैसे!

डिवाइडर की काली-सफेद पट्टियां एक दूसरे से लिपटी हुई भाग रही थीं। खयाल भी कुछ इसी तरह। ग्लैडिएटर… योद्धा… युद्ध…! किसके लिए युद्ध..! बड़े पदों पर आसीन कुलीनों के मनोरंजन के लिए… उन्माद में चीखती दर्शक दीर्घा… अपनी बारी का इंतजार करते एक बेड़े में खड़े ग्लैडिएटर! किसी एक को ढेर कर ही ये अपनी जिंदगी हासिल करेंगे। लेखक हावर्ट फास्ट, हम भी तो हैं ग्लैडिएटर! हमारा युद्ध क्यों! बस जीने भर के लिए! हमारा मकसद! घने कोहरे को छांटते हुए उस दफ्तर तक पहुंचना जो अब किसी मंजिल पर नहीं ले जाता… जहां कोई सफर नहीं… ठहराव… दिशाहीन… तालाब का पानी…!

तिराहे के साथ दिक्कत है कि आप एक ओर की सड़क को देख कर, दूसरी सड़क की ओर आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन तीसरी सड़क हमेशा एक मौके पर निर्भर करती है। ‘प्रॉबेबिलिटी’ के सिद्धांत खयालों में आ रहे थे। एक बात के घटने की संभाव्यता कितनी हो सकती है! अगला चौराहा घुप्प कोहरे की अंधेरी गुफा में तब्दील हो गया हो जैसे। कोई ओर-छोर नजर नहीं आ रहा था। डिवाइडर की पट्टियां भी गुम हो गर्इं। मन कर रहा था कि गाड़ी यहीं रोक दूं। लेकिन यह भी जानलेवा था। पीछे से आती कोई भी गाड़ी टक्कर मार देती।

अब यहां कट आ जाना चाहिए। ‘प्रॉबेबिलिटी’ का सिद्धांत क्या कहता है! सड़क पर अपनी उपस्थिति का अहसास कराने के लिए बीच में हॉर्न भी दे रही थी। मुझे अपने दफ्तर का गेट दिखाई दे गया। गाड़ी पार्क करते हुए भी कोहरा डरा रहा था। हमेशा की तरह बोगनवेलिया के पेड़ के नीचे गाड़ी लगाई, जिसके फूल गाड़ी के शीशे पर छा जाते थे। लौटने पर जैसे मेरा स्वागत करते हों। दफ्तर में प्रवेश के लिए कार्ड के साथ अंगूठा लगाते हुए सोचा कि जानलेवा सफर था, पर अब इस पर हंसा जा सकता था!

 

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