Jansatta Editorial Kisaan Ka Dukh - Jansatta
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किसान का दुख

दीप चंद सांखला कुछ दिन पहले एक शवयात्रा में जाना हुआ। उसमें शामिल अधिकतर का किसी न किसी रूप में किसानी से वास्ता था। शाम का समय, बादल फिर बरसने का हो रहा था। जिनकी आजीविका खेती पर टिकी थी, उनके चेहरे पर परेशानी साफ थी। एक ने ईश्वर को इंगित करते हुए कहा, वह […]

Author April 8, 2015 11:15 PM

दीप चंद सांखला

कुछ दिन पहले एक शवयात्रा में जाना हुआ। उसमें शामिल अधिकतर का किसी न किसी रूप में किसानी से वास्ता था। शाम का समय, बादल फिर बरसने का हो रहा था। जिनकी आजीविका खेती पर टिकी थी, उनके चेहरे पर परेशानी साफ थी। एक ने ईश्वर को इंगित करते हुए कहा, वह क्या चाहता है! एक बुजुर्ग ने जवाब दिया- ‘वह जो कर रहा है, सोच-समझ कर कर रहा है, गलत नहीं हो सकता!’ ईश्वर है या नहीं, इस पर संदेह है। भारतीय मनीषा में ईश्वर के होने न होने, दोनों ही धारणाओं की व्याख्या अनेक तरह की गई है। ऐसी आपदाओं को ईश्वर की इच्छा के साथ पिछले या इस जन्म की देनदारी या कर्मों का फल आदि मान कर आस्थावान-भाग्यवान अपने जी की तसल्ली कर लेते हैं। किसी की आस्था को कोई चुनौती नहीं है। लेकिन इस तरह की तसल्लियां असल सावचेती से हमें वंचित कर देती हैं।

केदारनाथ और कश्मीर घाटी में भारी बारिश की त्रासदी के बाद पिछले एक पखवाड़े से ज्यादा समय से उत्तर भारत के अधिकतर हिस्से में भारी बारिश हो रही है। तेज हवाओं और ओलों के साथ बिना जरूरत की इस बरसात से उगती, खड़ी-पकी सभी तरह की फसलें नष्ट हो रही हैं। नहरी खेती की तरह बारानी क्षेत्र में भी खेती नलकूपों से होने लगी है और साल में दो-तीन फसलें ली जाने लगी हैं। ये फसलें ज्यादातर व्यावसायिक होती हैं, यानी जिन फसलों की बाजार में कीमत ज्यादा मिल सकती है, वही बोई जाती हैं। जाहिर है, जिस फसल के दाम ऊंचे मिल सकते हैं, उसकी बोआई और सार-संभाल भी महंगी होगी। ऐसे में फसल नष्ट होगी तो नुकसान भी ज्यादा होगा। वे लोग जो अन्य करतूतों से कमाए अवैध धन को वैध करने के वास्ते सिंचित भूमि खरीद कर किसान बने या बन रहे हैं, ऐसी आपदाओं से उनकी खाल नहीं उधड़ी। मरता वह है जो अपने बूते या कर्जा लेकर कुछ कर रहा हो। ऐसे असल किसानों की खुदकुशी के समाचार हम आए दिन पढ़ते-देखते हैं। ऐसी भीषण विपदा में अपने यहां के किसान नहीं हैं। लेकिन महाराष्ट्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं का लगातार बढ़ता आंकड़ा चिंताजनक है।

किसानों का एक वर्ग और भी है, जो अवैध धनाढ्य लोगों के खेत बटाई पर लेते हैं, यानी जमीन और साधन अवैध धन को वैध करने वालों के और मेहनत या रखरखाव मजदूर किसान का। ऐसी विपदाओं में मजदूर किसानों को मरने की नौबत इसलिए नहीं आती कि दांव पर इनका केवल श्रम लगता है, अपनी आजीविका ये अतिरिक्त मेहनत-मजदूरी से चला लेते हैं। बहरहाल, आपदाएं चाहे पहाड़ों पर आती हों या मैदानी इलाकों में, इसके लिए जिम्मेदार हमारी वे हरकतें, बदलती जीवन-शैली और सामाजिक-धार्मिक कार्यकलाप हैं, जो आर्थिक लालच के चलते हम करते रहते हैं। हम प्रकृति के साथ लगातार ऐसा कुछ करने लगे हैं कि प्रकृति और पारिस्थितिकी खुद डगमगाने लगी है। गांधी ने कहा था कि यह धरती जरूरतें सबकी पूरी कर सकती है, लालच किसी एक का भी पूरा नहीं कर सकती। दोष खुद में ढ़ूंढ़ेंगे तो समाधान पर मनन की गुंजाइश बनेगी, अन्यथा ईश्वर, भाग्य, प्रारब्ध और कर्मों पर जिम्मेदारी डालना पलायन करना कहलाएगा या उस कबूतर की तरह जो बिल्ली को सामने पाकर यह मान कर आंखें मूंद लेता है कि बिल्ली उसे नहीं देख पाएगी। इसका यह मतलब कतई नहीं कि इन आपदाओं के लिए शासन-प्रशासन को बरी किया जा रहा है। उनकी जिम्मेदारियां अपनी जगह हैं और अकर्मण्यता या लापरवाहियों के उनके दोष कायम हैं।

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