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कानून की हत्या

वसीम अकरम त्यागी हाल ही में नगालैंड के दीमापुर में जो घटना हुई, उसे कुछ लोग समुदाय विशेष से जोड़ कर देख रहे हैं। लेकिन इसमें वे सवाल पीछे छूट रहे हैं जो ऐसी घटना के समय उठने चाहिए, जिसमें भीड़ ने जेल के अंदर से किसी व्यक्ति को निकाला, आठ किलोमीटर तक उसके घसीट-घसीट […]

Author March 19, 2015 9:03 AM

वसीम अकरम त्यागी

हाल ही में नगालैंड के दीमापुर में जो घटना हुई, उसे कुछ लोग समुदाय विशेष से जोड़ कर देख रहे हैं। लेकिन इसमें वे सवाल पीछे छूट रहे हैं जो ऐसी घटना के समय उठने चाहिए, जिसमें भीड़ ने जेल के अंदर से किसी व्यक्ति को निकाला, आठ किलोमीटर तक उसके घसीट-घसीट कर पीटा और फिर उसे मार दिया गया। सवाल है कि हजारों की भीड़ में क्या एक भी शख्स ऐसा नहीं रहा होगा, जिसका दिल इंसानों का हो? एक व्यक्ति को मारने और इस तरह मारने में बहुत बड़ा फर्क है। यह सब कुछ पुलिस की मौजूदगी में हुआ। भीड़ का गुस्सा तो इसे नहीं कहा जा सकता! ऐसा लगता है कि यह सुनियोजित तरीके से की गई एक हत्या थी, जिसमें स्थानीय प्रशासन, जेल प्रशासन और क्षेत्रीय राजनीति की भूमिका सवालों के घेरे में है।

बहरहाल, जैसा मंजर दीमापुर का रहा, वह कई माध्यमों के जरिए हम सबकी आंखों के सामने है। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने भी आर्इं। सवाल है कि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है, अपराध करता है तो उसके लिए सजा भारतीय कानून तय करेगा या फिर हजारों की वह भीड़, जिसने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में एक व्यक्ति को जेल से निकाला और फिर नंगा करके मारते हुए सात-आठ किलोमीटर तक घसीटा? जाहिर है, यह दूरी कोई पांच-दस मिनट में तय नहीं हो गई होगी। इसमें कम से कम दो-तीन घंटे का समय लगा होगा। क्या इस अंतराल में भी पुलिस का लापरवाह बने रहना उसे सवालों के कठघरे में खड़ा नहीं करता? अगर सब कुछ भीड़ को ही करना है तो फिर ये अदालतें, कानून की मोटी-मोटी किताबें, न्यायाधीश, वकील आदि की व्यवस्था आखिर क्यों है? जब सब कुछ भीड़ ही करेगी तो फिर कानून बनाने, लागू करने और अन्याय होने पर न्याय देने वाली संस्थाओं की क्या जरूरत है?

दीमापुर का मामला महज एक घटना नहीं है। इसने यह साबित किया है कि संविधान की दुहाई देने वाले राज्यों में कानून के प्रति लोगों की आस्था नहीं है। कुछ पुलिस बल का सहारा लेकर या उनके सामने भीड़ के उन्माद में कुछ भी किया जा सकता है। इस घटना में एक बड़ी विडंबना यह सामने आई कि बलात्कार के आरोपी व्यक्ति के बारे में बांग्लादेशी यानी ‘विदेशी’ होने का प्रचार किया गया। बाद में जैसी खबरें आर्इं, उसके मुताबिक मरने वाले व्यक्ति का भाई 1999 में कारगिल युद्ध में शहीद हुआ था। सवाल है कि अगर वह विदेशी या बांग्लादेशी था तो उसका भाई भारतीय सेना में कैसे पहुंच गया? जिस तरह कुछ लोगों ने दलील दी कि भारतीय नागरिकता पचास रुपए में मिल जाती है, वह यहां की समूची व्यवस्था और शासन के सामने एक बड़ी चुनौती है।

क्या पचास रुपए खर्च करने के बाद कोई विदेशी व्यक्ति भारतीय सेना में पहुंच जाता है और देश के लिए जान दे देता है? मार डाले गए आरोपी के पिता भी वायुसेना में रहे। यानी पिछली दो पीढ़ियों से यह परिवार सेना में रहा। इसके बावजूद संविधान और राष्ट्र से ऊपर दिख रही भीड़ और उसके नुमाइंदों को वह बांग्लादेशी नजर आया। कई बार दिमाग में यह सवाल आता है कि उस व्यक्ति की क्रूरता से हत्या करने वाली भीड़ को देश के संविधान को धता बताने के एवज किस रूप देखा जाना चाहिए! क्या उसके लिए भी कोई सजा तय की जाएगी!

 

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