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जीवन का स्वीकार

जवाहर चौधरी आज की भागती जिंदगी ने हर तरह के ठहराव को नकार दिया लगता है। परिवार को ही लीजिए, इस समय लाखों की संख्या में तलाक के प्रकरण अदालतों में लंबित हैं और हर रोज सैकड़ों नए प्रकरणों की भूमिका तैयार हो रही है। मुंबई, दिल्ली या बंगलुरु के आंकड़े सुर्खियों में दिखाई दे […]

Author Published on: March 21, 2015 7:29 AM

जवाहर चौधरी

आज की भागती जिंदगी ने हर तरह के ठहराव को नकार दिया लगता है। परिवार को ही लीजिए, इस समय लाखों की संख्या में तलाक के प्रकरण अदालतों में लंबित हैं और हर रोज सैकड़ों नए प्रकरणों की भूमिका तैयार हो रही है। मुंबई, दिल्ली या बंगलुरु के आंकड़े सुर्खियों में दिखाई दे जाते हैं, लेकिन छोटी जगहों में भी पारिवारिक तनाव हर चौथे घर में जगह बना चुका है। जहां तलाक का सब्र और समझ नहीं है, वहां आत्महत्या और हत्याएं तक हो रही हैं। हाल ही में दिल्ली के एक इंजीनियर के पत्नी को क्रिकेट बैट से पीट कर मार डालने की खबर चौंका रही है। छोटे शहर में भी पारिवारिक तनाव और विवाद के चलते आत्महत्या की खबरें अक्सर छपती रहती हैं। यह अच्छा है कि स्त्रियों में शिक्षा, सामर्थ्य और चेतना बढ़ी है। इसके साथ ही उनकी अपेक्षाएं और साहस भी बढ़ा है।

लगभग पैंतालीस साल पहले का वाकया है। हमारे एक साथी रामेन की शादी तय हुई। उन दिनों लड़की देखने या लड़के से पूछने का रिवाज नहीं था। बड़े अपने हिसाब से देखभाल कर सब तय कर लिया करते थे। लड़कों की हिम्मत नहीं कि कोई सवाल कर लें। खेती करने वाले परंपरावादी कृषक संयुक्त परिवार और हर घर में सामंती रवैया। ऐसे में रामेन को पता चला कि जिस लड़की से उसका विवाह होने जा रहा है वह सांवली और विकलांग है। उस जमाने में लड़कियों के पढ़ी-लिखी होने के उदाहरण बहुत कम पाए जाते थे। लेकिन खुद रामेन भी किसी तरह दसवीं कक्षा तक पहुंचा था।

रामेन की हिम्मत नहीं थी कि अपने पिता या घर में किसी दूसरे सदस्य से इस विषय में कुछ कह पाए। मैं दूसरे परिवार का था। हमारा बीज का व्यापार था। रामेन के पिता अक्सर हमारे यहां आते और बैठते थे, सो मेरा उनसे परिचय था। रामेन मुझसे साल भर छोटा है। इस दृष्टि से मैं भी उसके पिता का सामना करने का अधिकार तो नहीं ही रखता था, लेकिन बात जब कहीं बन नहीं पा रही थी तो साहस किया। मैंने कहा कि रामेन उस विकलांग लड़की से विवाह नहीं करना चाहता। यह सुन कर वे गंभीर हो गए। बोले- ‘अगर लड़की विवाह के बाद वैसी हो गई होती तो क्या हम या रामेन उसे निकाल देते?’ मैंने कहा कि वह बात अलग होती। लेकिन अभी तो…! मेरी बात बीच में काट कर वे बोले- ‘अगर कहीं रामेन ही पांव से लाचार हो गया होता तो क्या उसका विवाह नहीं हो पाता? आखिर कोई लड़की उससे विवाह करती ही!’

मैं इस बात का कोई जवाब नहीं दे पाया। उन्होंने साफ किया कि शादी-ब्याह दो परिवारों के बीच मानवीय संबंध भी है। लड़की जैसी आज है, उसके बच्चे वैसे नहीं होंगे। परिवार को और क्या चाहिए! और फिर हमने जुबान भी दे दी है। बात अटल है और उससे पीछे हटना कतई संभव नहीं है। खैर, रामेन की नहीं चली। हम विवाह में शामिल हुए। विवाह होते ही सारी समस्याएं समाप्त हुई मान ली गर्इं। जीवन की चक्की प्रेम से चल पड़ी। एक पांव में कमी संबंधों में कहीं बाधा नहीं बनी और वे जीवन का पहाड़ लांघ गए। तलाक कोई विचार न पहले कहीं था और पक्के तौर पर आगे भी नहीं होगा। आज के दौर में जिस तरह किसी छोटी कमी के चलते किसी को खारिज कर दिया जाता है, उसके मुकाबले रामेन के जीवन को पिछड़ा कहा जाएगा। लेकिन शुरुआती हिचकिचाहट के बाद रामेन के पास मनुष्यता का स्वीकार था, आधुनिक चकाचौंध में मरती इंसानियत के उलट।

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