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अरविंद दास देश के प्रतिष्ठित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पिछले कुछ समय से मीडिया और कला जगत में घमासान मचा है। संस्थान के विद्यार्थियों ने इस नियुक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और हड़ताल भी की। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी ने अपने एक कार्यकर्ता गजेंद्र चौहान को एफटीआइआइ […]

Author July 2, 2015 5:25 PM

अरविंद दास

देश के प्रतिष्ठित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पिछले कुछ समय से मीडिया और कला जगत में घमासान मचा है। संस्थान के विद्यार्थियों ने इस नियुक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और हड़ताल भी की। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी ने अपने एक कार्यकर्ता गजेंद्र चौहान को एफटीआइआइ का अध्यक्ष बनाया है। गजेंद्र चौहान ने टीवी धारावाहिक ‘महाभारत’ में युधिष्ठिर की भूमिका निभाई थी और उनके नाम कुछ बेनाम-सी फिल्में और दूसरे धारावाहिक भी हैं!

खबरों के मुताबिक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सामने श्याम बेनेगल, गुलजार और अडूर गोपालकृष्णन जैसे फिल्मकारों के भी नाम थे, पर उसने इस संस्थान के अध्यक्ष के लिए गजेंद्र चौहान के नाम पर अपनी मुहर लगाई। जाहिर है, नियुक्ति में कथित राष्ट्रवादी विचारधारा को तरजीह दी गई। कला, सौंदर्यबोध और एफटीआइआइ के इतिहास और भारतीय फिल्मों के इतिहास में इसकी महती भूमिका को नजरअंदाज किया गया।

भाजपा दिल्ली में सत्ता हासिल करने के बाद देश में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों पर बिठा रही है, ताकि देश में हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित हो सके। भारत जैसे बहुलतावादी समाज और संस्कृति के लिए यह खतरे की घंटी है। गौरतलब है कि इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वाई सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आइसीएचआर) का मुखिया नियुक्ति किया। इस नियुक्ति पर देश के जाने-माने इतिहासकार हतप्रभ थे।

वाई सुदर्शन राव का मानना है कि भारतीय इतिहास की सारी समझ वेद और महाभारत में है! इसी तरह गुजरात के एक कारोबारी और प्रधानमंत्री के करीबी जफर सरेशवाला को मौलाना आजाद नेशनल विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया। इन नियुक्तियों को लेकर अखबारों और सोशल मीडिया में भले ही छिटपुट विरोध दर्ज हुए हों, पर कोई व्यापक आंदोलन नहीं हुआ। इस बार एफटीआइआइ में गजेंद्र सिंह की नियुक्ति के विरोध के स्वर मुंबई से लेकर कोलकाता और दिल्ली तक सुनाई दे रहे हैं।

पुणे स्थित फिल्म संस्थान की आबोहवा में रचनात्मकता और अराजकता साथ-साथ चलती रही हैं। अगर आप इस संस्थान में कदम रखें तो ‘सिनमा आर नथिंग’, ‘सिनेमा इज ट्रुथ’ जैसे नारे (ग्रैफिटी) दीवारों पर अंकित दिखेंगे। घटक, हिचकॉक और जॉन अब्राहम की तस्वीरें यहां-वहां उकेरी हुई मिलेंगी। ‘विजडम ट्री ‘के आसपास देर रात तक बहस करते विद्यार्थी और बीयर की टूटी बोतलें मिलेंगी।

संस्थान के विद्यार्थियों-अध्यापकों के लिए सिनेमा एक जुनून से कम नहीं। और इसी जुनून की वजह से सरकार के इस फैसले के खिलाफ ‘फिल्म इज ए बैटलग्राउंड’, ‘स्ट्राइक डॉउन फासिज्म’ के नारों के साथ विद्यार्थी सड़क पर उतर गए। विद्यार्थियों की राय के मुताबिक एफटीआइआइ के अध्यक्ष रह चुके श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन, यूआर अनंतमूर्ति, गिरीश कर्नाड, सईद मिर्जा जैसों की तुलना में गजेंद्र चौहान का फिल्मों से परिचय, अनुभव और सिनेमाई समझ संदिग्ध है। वे इसे केंद्र सरकार की एक साजिश के तौर पर देखते हैं। उनका कहना है कि ‘सरकार अपनी सांस्कृतिक समझ हम पर थोपना चाहती है, जो फिल्म संस्थान की बनावट और बुनावट के विपरीत है।’

असल में पिछले कुछ वर्षों से एफटीआइआइ के निजीकरण को लेकर को सरकार योजना बनाती रही है, पर विद्यार्थियों के विरोध के कारण इसे स्थगित करना पड़ा है। बॉलीवुड की मायावी चमक से दूर एफटीआइआइ पिछले साठ वर्षों से सिनेमा के अर्थ और इसकी अर्थच्छवियों से विद्यार्थियों को रूबरू करवाता रहा है। इसने देश-विदेश में भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी है। आजाद भारत में ऐसे शैक्षणिक संस्थान गिनती के हैं, जिनकी उत्कृष्टता सर्वमान्य हो। एफटीआइआइ को ऐसे अध्यक्ष की जरूरत है, जिनकी पहचान राजनीतिक विचारधारा विशेष से न होकर सिनेमा से बनी हो!

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