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आग और फूल

कृष्ण कुमार मिश्र अग्नि के आविष्कार ने जब आदिमानव की जीवन शैली को अचानक बदला तो कोई नहीं जानता था कि प्रकृति में संघर्ष करता हुआ मानव जल्दी ही सभ्यता में प्रवेश करने वाला है। अग्नि में ढाले हुए उसके आदिम हथियार तब्दील होने वाले हैं। जो जीवन के लिए जरूरी था, अब वह सिर्फ […]

Author May 21, 2015 12:16 AM

कृष्ण कुमार मिश्र

अग्नि के आविष्कार ने जब आदिमानव की जीवन शैली को अचानक बदला तो कोई नहीं जानता था कि प्रकृति में संघर्ष करता हुआ मानव जल्दी ही सभ्यता में प्रवेश करने वाला है। अग्नि में ढाले हुए उसके आदिम हथियार तब्दील होने वाले हैं। जो जीवन के लिए जरूरी था, अब वह सिर्फ जरूरत भर का रहने वाला नहीं, सौंदर्य और आडंबर में तब्दील होने वाला है, अग्नि की परिक्रमा यानी ‘बोन फायर’ के चारों तरफ नाचते और गाते स्त्री-पुरुष कुछ ज्यादा अलहदा नहीं हैं उन हजारों वर्ष पहले के मानव से। आग को सदियों पुराना आदमी मीलों पैदल चल कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता था, जमीन में गड्ढा खोद कर प्राकृतिक ओवन में आग को संरक्षित करना सीख गया था और आग की अदला-बदली करना भी!

आदमी ने यह भी नहीं सोचा होगा कि उसके अप्रतिम आविष्कार अग्नि में वह जो मांस भूनता है, उसी में उसकी संततियां अन्न भूनेंगी और सती के नाम पर विधवाओं को भी! यही बानगी है इतिहास की कि वक्त के साथ-साथ इसकी नियति भी उलटती है। खंड-खंड-सा दिखने वाला अतीत कहीं न कहीं पतले तंतुओं से जुड़ा होता है।

सभ्यताओं के मिश्रण ने रीति-रिवाजों में बड़े बदलाव किए, कुछ खूबसूरत तो कुछ खराब। इस तरह, पता नहीं कब यह त्योहार भी आर्य-अनार्य, शक-हूण-कुषाण, मुगल और मौजूदा भारतीय समाज में संक्रमित होते हुए काल के इस छोर पर रंगों की होली में तब्दील हुआ। एक स्त्री के जलने की प्रक्रिया में कब विष्णु का अवतार हुआ और कब प्रह्लाद को जीवन-दान देकर वैष्णवों की शक्ति का गुणगान हुआ, यह सब तो दरबारी पुरोहित और कवि जानें, लेकिन मौजूदा समाज ने इसमें जो रंग भरे, वे अवश्य अतुलनीय हैं, स्नेहिल और भाईचारे से युक्त।

आम के पुराने बागों में तमाम तरह की झाड़ियां उगती हैं, जिनमें एक झाड़ी में सर्प के मुख की आकृति लिए एक पुष्प खिलता है, होली के त्योहार के आसपास। इसे ‘होली के फूल’ कहते हैं। लड़कियां इन सफेद फूलों को चुन-चुन कर सींक में गूंथती हैं, फिर गोबर के छेददार उपलों की माला के साथ इन फूलों को भी होली-स्थल पर चढ़ा आती हैं। दरअसल, इस सफेद फूल वाले पौधे का नाम ‘मालाबार नट’ है। इसे हिंदी में ‘अडूसा’, ‘रूसा’ या ‘रुसाहा’ भी कहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे ‘जस्टिसिया अधाटोडा’ नाम दिया है। भारतीय धरती की यह वनस्पति कई औषधीय गुणों से भरी हुई है। मलेरिया, ज्वर, क्षयरोग, मूत्र रोग और कफ की बीमारियों में इसकी जड़, पत्ते और फूलों का इस्तेमाल होता है। इस आदि-वनस्पति का मौजूदा मनुष्य से कितनी सदियों या फिर पीढ़ियों का नाता है, यह अध्ययन का विषय है।

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