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गुमनाम किसान

नीरज प्रियदर्शी अब तक बहसों और परिचर्चाओं में अक्सर सुना करता था कि बिहार के किसान अंदर से बहुत मजबूत होते हैं। उनके पास अदम्य साहस और सहनशीलता होती है। एक दूसरे धड़े का कहना था कि बिहार के किसान अपेक्षया कम खेती करते हैं। यानी दूसरे प्रदेशों के किसानों की तुलना में बिहार में […]

Author May 13, 2015 8:16 AM

नीरज प्रियदर्शी

अब तक बहसों और परिचर्चाओं में अक्सर सुना करता था कि बिहार के किसान अंदर से बहुत मजबूत होते हैं। उनके पास अदम्य साहस और सहनशीलता होती है। एक दूसरे धड़े का कहना था कि बिहार के किसान अपेक्षया कम खेती करते हैं। यानी दूसरे प्रदेशों के किसानों की तुलना में बिहार में नगदी या जीविकोपार्जन आधारित खेती कम की जाती है। इस प्रकार यहां के किसानों पर कम बोझ और जिम्मेदारी होती है। दरअसल, एक पक्ष बिहार के किसानों और खेती से भावनात्मक लगाव रखता है।

शायद किसी न किसी रूप में वह इनसे जुड़ा भी होता है और अपनी मनोदशा को ही किसानों की मनोदशा समझ लेता है। साफ है कि वह अपने पक्ष और स्थिति का आकलन अपने नजरिए और समझ के हिसाब से करता है। जो दूसरा पक्ष है, वह रिपोर्ट तैयार करता है, पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखता, टीवी की बहसों में भाग लेता, कृषि और अर्थशास्त्र के संदर्भ ग्रंथों को अपनी समझ में व्यापक तौर पर इस्तेमाल करता है। फसल उत्पादन और विकास दर को अपने हर एक वक्तव्य में उद्धृत करता है।

दोनों तरह के विचार बहुत हद तक स्थिति का वर्णन करने में सक्षम हैं। लेकिन पूरी स्थिति तब स्पष्ट होगी, जब हम वास्तव में सबसे निचले और बुनियादी स्तर पर इसकी पड़ताल करते हैं। मौके की स्थिति एक अलग तस्वीर पेश करती है। यहां आपकी मनेर के किसान गजेंद्र के परिवार से मुलाकात होगी। यह वह गजेंद्र नहीं है, जो किसी बहुप्रचारित रैली के दौरान पेड़ से लटक कर आत्महत्या करता है, जिसके हक के लिए समाजसेवी और सिविल सोसाइटी के लोग धरने देते हैं, अदालतों में याचिकाएं दायर की जाती हैं या जिसके प्रतिनिधि संसद में बेबाक होकर उसके हक की मांग करते हैं। यह उस प्रदेश से भी नहीं आता, जिसके कवरेज के लिए पत्रकारों और कैमरामैन का जत्था जाता है।

दरअसल, गजेंद्र और उसके जैसे किसान गुमनामी और अनदेखी का शिकार होकर अपनी सहनशीलता का परिचय देते हैं। वे उत्पादन और पैदावार के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय पटल पर रिकार्ड विकास दर दर्ज कराते हैं। ये वे किसान हैं, जो खेती के नए तरीकों को ढूंढ़ते हैं और समूची दुनिया उन्हें अपनाती है। लेकिन राष्ट्रीय पटल पर इसकी गूंज दूसरे प्रदेशों के किसानों की आत्महत्या और अपने प्रदेश की राजनीति के मकड़जाल में दब कर रह जाती है।

इन सबके बावजूद यह किसान आज भी प्रेमचंद के उपन्यासों का नायक बना हुआ है। उसकी माली हालत आज भी वैसी ही है जो औपनिवेशिक काल के दौरान थी। आखिर वह अपने जीवन की इहलीला समाप्त करता है। अधिकतर मामलों में तो जीवन प्राकृतिक आपदाओं की भेंट चढ़ जाता है। वह इतने कर्ज में डूब जाता है कि उससे उबरने के लिए आत्महत्या के बजाय शहर में पलायन को तवज्जो देता है। हालांकि गजेंद्र शहर नहीं जा पाया, क्योंकि उसे परिवार की फिक्र थी। वह टीवी कैमरों के सामने नहीं, बल्कि बंद कोठरी के अंधेरों में दम तोड़ता है। वह गुमनाम है। उसकी खबर अखबारों को मौत के पांच दिन बाद मिलती है। वह केवल स्थानीय पन्नों और क्षेत्रीय टीवी चैनलों पर स्थान बना पाता है।

अगर बिहार के किसानों और खेती को जानना है तो पहले गजेंद्र जैसे किसान की व्यथा को जानना होगा। वह सरकार को नहीं कोसता है, बल्कि जीवनदाता को कोसता है। हम बिहार के किसानों और खेती में प्रगति के अभिलाषी हैं तो सबसे पहले इन्हें मुख्यधारा में लाना होगा। बिहार के किसान सुर्खियों में नहीं रहना चाहते हैं, लेकिन उन्हें जागरूक करने की आवश्यकता है। सहनशीलता, परिश्रम और जुझारूपन से लबरेज किसानी ही नहीं, बल्कि गुमनामी और बेरुखी के दंश को भी देखिए।

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