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शिक्षा से खिलवाड़

राकेश प्रकाश बेहतर कल के लिए स्कूलों में शिक्षा नीति कैसी हो, इसे लेकर आजादी के बाद से अब तक मंथन जारी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर गिरता जा रहा है, यह खुलासा खुद दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने किया। मगर शिक्षा नीति को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने […]

Author March 30, 2015 8:09 AM

राकेश प्रकाश

बेहतर कल के लिए स्कूलों में शिक्षा नीति कैसी हो, इसे लेकर आजादी के बाद से अब तक मंथन जारी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर गिरता जा रहा है, यह खुलासा खुद दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने किया। मगर शिक्षा नीति को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने चुप्पी साध रखी है। यहां तक कि मनीष सिसोदिया समेत कई दूसरे नेताओं के पत्र लिख कर सभी बच्चों को पास करने की नीति पर सवाल उठाए जाने के बाद भी अभी तक स्मृति ईरानी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

देश में बुनियादी शिक्षा और खासकर गांवों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर कई योजनाएं बनीं। सर्वशिक्षा अभियान पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए, लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। गांवों में स्कूली शिक्षा को लेकर राज्यों के शिक्षा विभागों की अलग-अलग राय है। दिल्ली सरकार के मुताबिक स्कूली शिक्षा के गिरते स्तर के लिए अध्यापक और स्कूल प्रबंधन से ज्यादा देश की शिक्षा नीति जिम्मेदार है। वर्तमान में देश में लागू सभी बच्चों को पास करने की नीति के कारण कक्षा आठ तक बच्चों की पढ़ाई पर कोई निगरानी नहीं है। इस तरह करीब पच्चीस फीसद बच्चे हर साल फेल होते हुए भी पास होते हैं। यह चौंकाने वाला आंकड़ा दिल्ली के स्कूलों का है, तो देश के पिछड़े इलाकों में शिक्षा का अंदाजा लगाया जा सकता है।

आज भी ग्रामीण इलाकों में कई ऐसे स्कूल हैं, जहां शिक्षक नहीं हैं। अगर शिक्षक हैं तो स्कूल में बच्चों के बैठने की जगह नहीं है। ऐसे में सभी बच्चों को बिना उचित शिक्षा और बगैर किसी मापदंड के सीधे-सीधे पास करना किस हद तक उचित है। इससे बच्चों में पढ़ने की इच्छा और शिक्षकों में जिम्मेदारी की भावना कम हो रही है। चूंकि सभी बच्चों को पास करना है, लिहाजा शिक्षक भी गंभीरता से बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं। पूरे पाठ्यक्रम को लेकर बच्चों में पढ़ाई और परीक्षा के प्रति उदासीनता का भाव देखने को मिलता है। बच्चे आसानी से आठवीं कक्षा तक तो पास हो जाते हैं, पर नौवीं में आते ही उनके सामने मुसीबत खड़ी हो जाती है। यही कारण है कि नौवीं कक्षा में सबसे ज्यादा बच्चे फेल हो रहे हैं। देश और समाज में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो पढ़े-लिखे तो हैं, लेकिन समझदार नहीं हैं। लिहाजा, शिक्षा के अधिकार कानून में बदलाव की जरूरत है। सभी बच्चों को पास करने की नीति तीसरी कक्षा तक ही लागू रहनी चाहिए। चौथी कक्षा से शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

इसे ध्यान में रख कर यूपीए सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून में बदलाव करने की तैयारी की थी, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया गया है। यूपीए सरकार ने मार्च 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया था। इसमें पहली से लेकर आठवीं तक के छात्रों को फेल नहीं करने की नीति शामिल थी। मगर हाल के सालों में देखा गया कि यह नीति अपनाने के बाद शिक्षक और छात्र पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं रह गए हैं। इसका असर दसवीं और बारहवीं कक्षा के परिणाम पर भी पड़ा है। पहले जहां दोनों कक्षाओं का परीक्षा परिणाम सत्तर से पचहत्तर प्रतिशत तक रहता था, वह अब पचास से साठ फीसद के बीच पहुंच गया है।

हाल के दिनों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता बढ़ाने की कोशिशें केंद्र सरकार की ओर से की गई हैं। लेकिन उससे ज्यादा जरूरी प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के गिरते स्तर को सुधारना है। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड दुबारा पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा शुरू करने की सिफारिश कर चुका है। देखना है, सरकार इस मुद्दे पर कब कारगर कदम उठाती है।

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