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भविष्य की उलझन

सुधीर झा मेरे पड़ोस में एक लड़की रहती है। अच्छे माने जाने वाले निजी स्कूल से विज्ञान विषय में उसने नब्बे फीसद अंकों के साथ बारहवीं की परीक्षा पास की है। उसके परिवार के सदस्यों से मेरी बातचीत होती है। सो, मैंने उससे भविष्य की योजना के बारे में पूछा। उसने मासूमियत से कहा- ‘पापा […]

Author June 17, 2015 5:57 PM

सुधीर झा

मेरे पड़ोस में एक लड़की रहती है। अच्छे माने जाने वाले निजी स्कूल से विज्ञान विषय में उसने नब्बे फीसद अंकों के साथ बारहवीं की परीक्षा पास की है। उसके परिवार के सदस्यों से मेरी बातचीत होती है। सो, मैंने उससे भविष्य की योजना के बारे में पूछा। उसने मासूमियत से कहा- ‘पापा कह रहे हैं कि एक साल आइआइटी की कोचिंग में पढ़ाई कर लूं। लेकिन मेरा मन है दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कॉलेज से भौतिकी में आॅनर्स करूं। बाद में तो आइएएस ही बनना है!’ यह जवाब मुझे कुछ अपना-सा लगा। यह समय होता है घर से बाहर निकल कर व्यावहारिक जिंदगी जीने, नए सपने देखने और भविष्य की ओर उड़ान भरने का। अगर किसी ने इसमें बाधा पहुंचाने की कोशिश की तो वह सबसे बड़ा दुश्मन नजर आता है। हालांकि उसकी सलाह सही भी हो सकती है।

इस बार भी परीक्षाओं के नतीजे कुछ के लिए खुशी लेकर आए तो कुछ बच्चे इससे निराश भी हुए। मगर हर किसी का अपना सपना है। बदलते परिवेश और उम्र के साथ-साथ बच्चों के ख्वाब भी नई उड़ान भर रहे हैं। भारतीय समाज का ताना-बाना कुछ ऐसा है कि अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों में कलक्टर की छवि देखने लगते हैं। दसवीं-बारहवीं की पढ़ाई करते किशोरों पर कई बार भावनाएं हावी हो जाती हैं। इस दौरान बच्चा परिवार से बाहर की दुनिया से भी संपर्क साधना चाहता है। स्कूल के बाद कॉलेज की जिंदगी की कल्पना उसे बार-बार रोमांचित करती है, जहां की आजाद हवा के बारे में अभी तक उसने बस सुना होता है।

उम्र का यह पड़ाव जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा होता है, खासकर कॅरियर के लिहाज से। यहां अभिभावकों की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है। उन्हें अपने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए बच्चों की रुचियों के साथ-साथ उनकी क्षमता का भी आकलन करना पड़ता है। आमतौर पर न तो विद्यार्थी को खुद अपने बारे में पता होता है और न अभिभावक ठीक से समझ पाते हैं कि उनके बच्चे की रुचि किसमें है। विद्यार्थी अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश में होते हैं और अभिभावकों की अपनी अपेक्षाएं होती हैं। दोनों के बीच सामंजस्य बिठाना किसी चुनौती से कम नहीं होता है।

शिक्षा और रोजगार की तस्वीर जिस गति से बदलती जा रही है, उसमें बारहवीं कक्षा के बाद अपने भविष्य की सही राह चुनना मुश्किल हो चुका है। अब वह जमाना नहीं रहा जब कॅरियर बनाने के विकल्प बहुत कम होते थे। आज विकल्पों का संजाल सामने है।

लेकिन सच यह है कि बाजार में उपलब्ध तमाम विकल्पों से एक नई समस्या यह पैदा हो गई है कि कई बार विद्यार्थी ऊहापोह की स्थिति में फंस जाते हैं। जाहिर है, कॅरियर चुनते वक्त बच्चों की सहायता करना आज अभिभावकों जिम्मेदारी बन चुकी है। उन्हें भविष्य या कॅरियर के मद्देनजर अपने बच्चों की रुचियों का ध्यान रखना पड़ता है। किसी खास विकल्प को चुनने से पहले आर्थिक सामर्थ्य एक सबसे अहम पहलू होता है। बगैर इसके साथ तालमेल बिठाए किसी क्षेत्र में कामयाब होना थोड़ा मुश्किल है।

ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिनमें विद्यार्थियों को कॅरियर के किसी महंगे विकल्प को चुन लेने के बाद पछताना पड़ा। जाहिर है, आर्थिक पक्ष आज बच्चों के भविष्य की दिशा को प्रभावित कर रहा है और यहीं एक तरह से समाज दो स्तरों पर विभाजित होने लगता है। अब सवाल है कि ऐसा विभाजन किस तरह देश को मजबूत करेगा! क्या इसमें सरकार और उसकी व्यवस्थाओं की कोई भूमिका है? व्यवस्था में खामी से निपटना या उसे दूर करना किसकी जिम्मेदारी है?

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