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रिश्ते के बहाने

राजेंद्र बंधु दिल्ली उच्च न्यायालय के हाल ही एक फैसले के मुताबिक पति द्वारा पत्नी की मर्जी के विरुद्ध उससे यौन संबंध बनाना बलात्कार या अपराध की श्रेणी में नहीं आता। एक युवती को नशीला पेय पिला कर उससे विवाह करने और उससे बलात्कार करने के आरोपी युवक को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। इस […]

Author May 16, 2015 10:10 PM

राजेंद्र बंधु

दिल्ली उच्च न्यायालय के हाल ही एक फैसले के मुताबिक पति द्वारा पत्नी की मर्जी के विरुद्ध उससे यौन संबंध बनाना बलात्कार या अपराध की श्रेणी में नहीं आता। एक युवती को नशीला पेय पिला कर उससे विवाह करने और उससे बलात्कार करने के आरोपी युवक को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले से कई विधिक और समाजशास्त्रीय सवाल खड़े हो गए हैं। क्या किसी पुरुष द्वारा किसी महिला का उत्पीड़न इसलिए अपराध नहीं है कि उनके बीच पति-पत्नी का रिश्ता है? बलात्कार और यौन संबंधों के अंतर को समझे बिना इस सिद्धांत को स्थापित करना महिलाओं के जीने के अधिकार को प्रभावित करता है।

यह स्पष्ट है कि पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों को महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा अधिकार हैं। पितृसत्ता आधारित परिवार में बचपन से ही पुरुषों को शासक या सत्ताधारी के रूप में विकसित किया जाता है। इस स्थिति में विवाह के बाद पति-पत्नी के बीच के संबंध बराबरी के न होकर एक शासक और शासित के रूप में स्थापित हो जाते हैं, जिसमें स्त्री को पुरुष प्रधान समाज द्वारा स्थापित मूल्यों का पालन करना होता है। जब महिलाएं शासित होने से इनकार करती हैं तो उनके उत्पीड़न का सिलसिला शुरू हो जाता है। लेकिन उनके उत्पीड़न को मात्र इसलिए जायज नहीं ठहराया जा सकता कि उत्पीड़न करने वाला उसका पति है। तब भला पति द्वारा पत्नी के बलात्कार को कैसे जायज ठहराया जा सकता है?

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इस मसले पर राजनीतिक हलके में भी बहस जारी है। सच यह है कि भारतीय दंड संहिता में वैवाहिक बलात्कार जैसी कोई अवधारणा नहीं है। भारत की संसद ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम सहित कई ऐसे कानून बनाए। लेकिन कुछ मुद्दों पर कानूनी विसंगतियां महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और समता के लिए बाधक बनी हुई हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार सोलह वर्ष से कम उम्र की पत्नी से बलात यौन संबंध को अपराध की श्रेणी में माना गया है। जबकि सोलह वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ जबर्दस्ती यौन संबंध को भी बलात्कार अपराध नहीं माना गया है।

यह सरकार में बैठे लोगों की पितृसत्तात्मक विचारधारा का नतीजा है कि एक जैसे अपराध के लिए आरोपी और पीड़ित के बीच रिश्तों के आधार पर दंड की मात्रा अलग-अलग तय की गई है। इसके साथ ही सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को मानने वाला कोई भी कानूनी प्रयास अब तक नहीं किया। दिल्ली में सोलह दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा कमेटी ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई अनुशंसाएं कीं और उनके आधार पर सरकार द्वारा आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक पारित किया गया। जस्टिस वर्मा ने वैवाहिक बलात्कार को भी अपराध की श्रेणी में रखते हुए उसके लिए दंड की अनुशंसा की। लेकिन गृह मंत्रालय ने विधि आयोग की एक सौ बहत्तरवीं रिपोर्ट का हवाला देते हुए वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने से इनकार कर दिया।

संयुक्त राष्ट्र की ओर से कराए गए एक शोध अध्ययन के मुताबिक भारत में पंद्रह से उनचास वर्ष की दो तिहाई से अधिक महिलाओं को पति द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। दुनिया के परिदृश्य पर नजर डालें तो बावन देशों में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना गया है। आज जबकि हमारे प्रधानमंत्री भारत को दुनिया में तेजी से विकसित हो रहे देश के रूप में पहचान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं, भारत में विज्ञान, तकनीकी और व्यापार-व्यवसाय का तेजी से विकास हो रहा है, ऐसे में महिलाओं के मामले में पुरातन सोच से बाहर निकलना जरूरी है। देश और उसके नागरिक आर्थिक रूप से कितने ही सशक्त क्यों न हों, जब तक महिलाएं अपने घरों में सुरक्षित नहीं होंगी, तब तक तमाम विकास बेमानी होंगे।

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