भेदभाव का योग - Jansatta
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भेदभाव का योग

वीरेंद्र जैन जो योग हमारे देश की पहचान है और जिसके महत्त्व को हमने पूरे विश्व से स्वीकार करा लिया है, उसका एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में विरोध पहली नजर में हास्यास्पद लग सकता है। योग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होने से किसी की असहमति नहीं है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय […]

Author June 15, 2015 2:22 PM

वीरेंद्र जैन

जो योग हमारे देश की पहचान है और जिसके महत्त्व को हमने पूरे विश्व से स्वीकार करा लिया है, उसका एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में विरोध पहली नजर में हास्यास्पद लग सकता है। योग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होने से किसी की असहमति नहीं है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के दिन सामूहिक योग करने का और इसके एक आसन सूर्य नमस्कार के बहाने कुछ मुसलिम नेता इसका विरोध कर रहे हैं। यह समझना जरूरी है कि इस विरोध के मूल में योग नहीं, बल्कि वे लोग और उनका चरित्र है, जो इस कार्यक्रम का आह्वान कर रहे हैं। अगर समाज में सांप्रदायिकता और जातिवाद का जहर फैला होता है तो अपने प्रतिद्वंद्वी का कोई अच्छा प्रस्ताव भी बुरा लगता है या उस पर संदेह होता है। विपरीत पक्ष पहले विरोध का कोई तर्क तलाशता है और फिर उसे अपने समाज की व्यापक सहमति वाले विचार से जोड़ कर उस पर कठोर होता जाता है। योग के कार्यक्रम के साथ यही स्थिति है।

भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों का जो मूल जनाधार है और उनके जो आचरण रहे हैं, उसे देखते हुए मुसलमान उन पर भरोसा नहीं कर सकते। विडंबना यह है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में डाले गए मतों का बहुमत प्राप्त करने वाला दल सत्ता हासिल कर सकता है, लेकिन जिस बिखरे बहुमत ने उसका विरोध किया होता है, उसकी सहमति पाने की कोई व्यवस्था नहीं है। इस तरह अल्पमत का विचार बहुमत पर थोपने के प्रयास में संघर्ष पैदा होता है। भाजपा का एक बड़ा जनाधार कट्टरवादी दुष्प्रचार से प्रभावित उन लोगों से बनता है जो इस्लाम और ईसाई धर्म-संस्कृति को देश से निर्मूल करने के विचार को मानने लगे हैं और दूसरों को भी हिंसा में भाग लेने के लिए उकसाते रहते हैं। इस पार्टी के इतिहास में अल्पसंख्यकों, खासतौर पर मुसलमानों के खिलाफ निर्मम हिंसा की घटनाएं दर्ज हैं, जिस पर उन्होंने कभी दुख व्यक्त नहीं किया।

भाजपा शासित राज्यों में स्कूल दाखिले के समय बच्चों को तिलक लगाने की सलाह को मस्तिष्क के ज्ञान बिंदु को जागृत करने की अवधारणा से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। जो बच्चे नहीं तिलक नहीं लगाना चाहते, उन्हें इसकी छूट देकर बच्चों के बीच आपस में भेद पैदा करने की ही कोशिश की गई है। सारी दुनिया के बच्चे बिना तिलक लगाए भी स्कूल जाते हैं, अच्छी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और अपेक्षाकृत बेहतर कर रहे हैं। इसी तरह, भोजन मंत्र का पाठ या मिड डे मील में अंडा देने या न देने के विवाद भी भेद पैदा करने की योजना का हिस्सा हैं।

मैंने एक भाजपा नेता से पूछा था कि राम मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद आप लोगों की राजनीति का क्या होगा! उत्तर में उसने कहा था कि अभी न केवल काशी-मथुरा बाकी है, बल्कि साढ़े तीन सौ ऐसी इमारतें सूचीबद्ध हैं, जिनके सहारे अपनी राजनीति करते रहेंगे। धर्म परिवर्तन, घर-वापसी, रामसेतु, बांग्लादेशी शरणार्थियों जैसी न जाने कितनी विभाजनकारी योजनाएं उनके बस्ते में हैं। आपातकाल में उभरे धीरेंद्र ब्रह्मचारी उस दौरान नियमित रूप से टीवी पर योग प्रशिक्षण देते थे, जिसे टीवी तक कम पहुंच के बावजूद बहुत लोग देखते थे। हालांकि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी का साथ देने के कारण बहुत लोग उनसे नाराज थे, पर योग कभी निशाना नहीं बना। जैसे ही भाजपा ने योग की लोकप्रियता से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू की तो स्वाभाविक रूप से बहुत सारे लोगों को योग से भी अरुचि होने लगी।

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