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कदाचार की डिग्री

अशोक कुमार बिहार में इन दिनों मैट्रिक की परीक्षा सुर्खियों में है। परीक्षा में नकल करते परीक्षार्थी और इस काम में मदद करते अभिभावकों की तस्वीरें जारी की गर्इं। यही नहीं, काम में प्रशासन से लेकर शिक्षक और संस्थाओं तक को सहयोग देते पाया गया। ये वही लोग होते हैं, जो परीक्षा समाप्ति के बाद […]

Author March 26, 2015 10:21 AM

अशोक कुमार

बिहार में इन दिनों मैट्रिक की परीक्षा सुर्खियों में है। परीक्षा में नकल करते परीक्षार्थी और इस काम में मदद करते अभिभावकों की तस्वीरें जारी की गर्इं। यही नहीं, काम में प्रशासन से लेकर शिक्षक और संस्थाओं तक को सहयोग देते पाया गया। ये वही लोग होते हैं, जो परीक्षा समाप्ति के बाद मीडिया के सामने गर्व से बताने की कोशिश करते हैं कि कदाचारमुक्त परीक्षा का सफलता से संचालन हुआ। परीक्षा दे रहे विद्यार्थी और उनके अभिभावक भी लोगों के बीच यह शान बघारते चलते हैं कि लड़के को परीक्षा में काफी मेहनत करनी पड़ी। सवाल है कि आखिर क्या मतलब है ऐसी परीक्षाओं का! सरकार से लेकर परीक्षार्थियों और उनके अभिभावकों की क्या समझ है कदाचार में सनी ऐसी परीक्षा और डिग्रियों के बारे में? इन डिग्रियों की अहमियत किसी रोजगार की शर्त पर तो हो सकती है, लेकिन क्या इन डिग्रियों के बल पर दक्षता भी हासिल की जा सकती है?

यह विचार करने की बात है कि कहीं हम सब इस व्यवस्था की साजिश में उलझ तो नहीं रहे हैं, जो जानबूझ कर एक भीड़ खड़ी करना चाहती है। इस भीड़ में सर्टिफिकेट तो लाखों के पास हो, मगर दक्षता किसी के पास नहीं। मौजूदा सरकार ने ऐसे लोगों को प्रोत्साहन भी दिया ‘डिग्री लाओ नौकरी पाओ’ की नीति अपना कर। इसके तहत आज सरकारी स्कूलों में ऐसे शिक्षकों की भरमार है जो पांचवीं और छठी कक्षा के बच्चों को ठीक से पढ़ाने की दक्षता भी नहीं रखते हैं। ऐसे शिक्षकों के भरोसे चल रहे शिक्षण कार्य से क्या उम्मीद की जा सकती है?

प्राथमिक कक्षाओं को छोड़ दिया जाए तो स्कूलों-कॉलेजों में लगातार विद्यार्थियों की संख्या घटती जा रही है। परीक्षा पास करना ही विद्यार्थियों का उद्देश्य बन गया है। इसके लिए शहर से लेकर गांव तक परीक्षा पास करवाने की दुकानें खुल गई हैं, जहां सुबह से देर रात तक विद्यार्थियों का हुजूम रहता है। जानबूझ कर एक ऐसी व्यवस्था कायम की गई है, जिसने शिक्षा को बाजार में ला खड़ा किया है। एक ओर देश-विदेश की बड़ी कंपनियों को देश में पूंजी लगाने का न्योता दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ ऐसे डिग्रीधारियों की फौज तैयार की जा रही है। सरकार की मंशा साफ दिख रही है। लोग या तो इसे नहीं देख पा रहे हैं या देख कर भी नजरअंदाज कर रहे हैं। जो भी कंपनियां यहां आ रही हैं, उनका मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना है। इसके लिए ये कंपनियां किसी डिग्रीधारी को नहीं, बल्कि दक्ष और कुशल लोगों को ही मौका देंगी। डिग्री लेकर लाइन में खड़े हजारों-लाखों लोगों को अगर नौकरियां मिल भी जाएं तो उनका शोषण होना तय है।

बिहार की इन परीक्षाओं को देखने के बाद हिंदी फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ का यह संवाद बिहार के विद्यार्थियों के लिए और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि ‘सफल नहीं, काबिल बनो’। लेकिन शायद इस संवाद को न विद्यार्थी समझ रहे हैं और न अभिभावक। इससे भी ज्यादा इस स्थिति को शह दे रहे हैं प्रशासन में बैठे वे लोग, जो बेहिचक कहते हैं कि कदाचारमुक्त परीक्षा का सफलता से संचालन हुआ। मीडिया में आ रही बिहार की परीक्षाओं की गंदी तस्वीर को सरकार किस तरह लेती है, यह तो वही जाने, लेकिन हमारी भी नैतिक जवाबदेही है कि अपनी संतानों को कदाचार से बचा कर अच्छी पढ़ाई के लिए उनका मनोबल बढ़ाएं। एक सवाल मीडिया से भी किया जाना चाहिए कि जिस तरह इस साल गड़बड़ियों को वह शिद्दत से उठा रहा है, पिछले कई सालों से यही स्थिति बने रहने पर उसने चुप्पी क्यों ओढ़ रखी थी!

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