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हाशिये के नायक

मनोज चाहिल चौदह अप्रैल को आधुनिक भारत के जननायक बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर की एक सौ पच्चीसवीं जयंती मनाई जाएगी। आंबेडकर लोकतंत्र को किसी भी शासन व्यवस्था का सबसे अच्छा स्वरूप मानते थे। वे कहते थे कि ‘अगर कोई मुझसे पूछे तो मेरा आदर्श होगा एक ऐसा समाज जो स्वतंत्रता, समता और भातृत्व पर आधारित […]

Author April 14, 2015 10:13 AM

मनोज चाहिल

चौदह अप्रैल को आधुनिक भारत के जननायक बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर की एक सौ पच्चीसवीं जयंती मनाई जाएगी। आंबेडकर लोकतंत्र को किसी भी शासन व्यवस्था का सबसे अच्छा स्वरूप मानते थे। वे कहते थे कि ‘अगर कोई मुझसे पूछे तो मेरा आदर्श होगा एक ऐसा समाज जो स्वतंत्रता, समता और भातृत्व पर आधारित हो। मैं किसी अन्य की कल्पना नहीं कर सकता। एक आदर्श समाज गतिशील होना चाहिए, यह ऐसे साधनों से पूर्ण होना चाहिए, ताकि एक भाग में होने वाला परिवर्तन दूसरे भाग में पहुंचाया जा सके।’

हिंदू धर्म के प्रखर आलोचक रहे आंबेडकर को आजकल हिंदूवादी संगठन अपना दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि वे आरएसएस जैसे हिंदू संगठन के प्रशंसक थे। जाहिर है, ऐसा वे आंबेडकर के मूल्यों को अपनाने के लिए नहीं कर रहे हैं। वर्तमान भाजपा सरकार के आते ही कुछ संगठन अधिक सक्रिय हो गए हैं और अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को बढ़ाने में लगे हैं।

जिन वेदों और धार्मिक ग्रंथों को महान बता कर ऐसे संगठन अपनी सर्वोपरिता सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं और ‘जो वेदों में नहीं है वह कहीं नहीं है’ का नारा लगा रहे हैं, उन ग्रंथों के बारे में आंबेडकर के विचारों को शायद पढ़ने की जहमत भी इन्होंने नहीं उठाई। जिस गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की बात भाजपा के नेता कह रहे हैं और जिसे हरियाणा के स्कूलों के पाठ्यक्रम में संविधान के मूल्यों को दरकिनार करते हुए डाल दिया गया है, उस गीता के बारे में आंबेडकर के क्या विचार थे, शायद इससे भी वे अनभिज्ञ हैं। अन्यथा या तो वे आंबेडकर को अपनाने की बात न करते या फिर ऐसे निर्णय नहीं लेते! आंबेडकर इन ग्रंथों की ‘श्रेष्ठता’ को सीधे-सीधे शब्दों में खारिज किया है।

इसी तरह हिंदू धर्म के बारे में उनके विचारों को जानने के बाद शायद ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ उन्हें अपनाने के बात नहीं करते। चार फरवरी 1933 को महात्मा गांधी के साथ हुई बैठक में उन्होंने साफ कहा कि ‘जिस धर्म में मुझे तुच्छ और पतित माना जाता हो, उस धर्म को मैं अपने लिए गौरव क्यों मानूं!’

दरअसल, ऐसा नहीं है कि हिंदूवादी संगठनों को आंबेडकर से ‘प्रेम’ हो गया है या इन्होंने अपने ‘आदर्शों’ को तिलांजली दे दी है। इनके साथ दिक्कत यह है कि ये नायक बनाएं तो किसे बनाएं! जिन गोलवलकर, सावरकर और हेडगेवार को ये अपना गुरु मानते हैं, वे इस महानायक के सामने कहीं भी नहीं टिकते। वे लोकतंत्र, समानता, भातृत्व, स्वतंत्रता में विश्वास नहीं रखते। वे स्त्री स्वतंत्रता की बात नहीं करते। अगर समानता में विश्वास रखते तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में महिलाओं का प्रवेश वर्जित नहीं होता और उन्हें उनके लिए ‘राष्ट्रीय सेविका समिति’ अलग से खोलने की आवश्यकता नहीं होती, जिसमें ‘स्वयं’ के लिए कोई स्थान नहीं है। इनका मानना है कि महिलाओं के लिए तो ‘स्वयं’ या ‘सेल्फ’ की आवश्यकता ही नहीं है।

‘मनु-स्मृति’ जिनका आदर्श हो, वे समानता के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? यों भी मनुस्मृति से लेकर लगभग सारे धार्मिक ग्रंथों ने महिलाओं को दोयम दर्जे पर ही रखा है जो पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकती। ये लोग यह भी भूल जाते हैं कि आजाद भारत के इतिहास में आंबेडकर पहले इंसान थे, जिन्होंने महिलाओं के हक के लिए अपने पद से इस्तीफा दिया था। वे उत्पीड़ितों के हक के इतने बड़े पैरोकार थे। जब आंबेडकर ने संविधान सभा में स्त्रियों के हक, उन्हें संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी दिलाने, उनके साथ समानता का व्यवहार करने की बात की तो उनके खिलाफ बोलने वालों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी प्रमुख व्यक्ति थे, जिन्हें ये अपना ‘आदर्श’ मानते हैं।

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