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भेदभाव के रंग

अनुज दीप यादव पिछले दिनों लगातार कुछ नेताओं की महिलाओं या दूसरे लोगों के रंगरूप पर की गई टिप्पणियों पर काफी विरोध और आपत्तियां सामने आर्इं। लेकिन कुछ दिनों तक चली बहसों के बाद सब कुछ सामान्य दिखने लगा। ऐसे बयान राष्ट्रीय स्तर पर उतना प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सके, जितना इसके विरोध में होना […]

Author April 9, 2015 11:10 PM

अनुज दीप यादव

पिछले दिनों लगातार कुछ नेताओं की महिलाओं या दूसरे लोगों के रंगरूप पर की गई टिप्पणियों पर काफी विरोध और आपत्तियां सामने आर्इं। लेकिन कुछ दिनों तक चली बहसों के बाद सब कुछ सामान्य दिखने लगा। ऐसे बयान राष्ट्रीय स्तर पर उतना प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सके, जितना इसके विरोध में होना चाहिए था। वजह साफ है। आज भी भारतीय समाज पुरुषवादी मानसिकता की जंजीरों में मजबूती से जकड़ा हुआ है। हम रंगों के त्योहार को मनाते हुए सभी रंगों को एक जैसा मानते हैं, लेकिन बात अगर त्वचा के रंग की हो तो सबसे पहले प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं।

एक ओर रंग का गहरा या सांवला होना अभिशाप माना जाता है तो वहीं चंद हफ्तों में गोरा बनाने और बेदाग निखार देने के दावे के साथ क्रीम का व्यापार करने वाली कंपनियों के लिए मुनाफे का इतना बड़ा अवसर है जो केवल भारत में इन्हें हजारों करोड़ का व्यापार देता है। रंग को लेकर जिस तरह के पूर्वग्रह भारतीय समाज में व्याप्त हैं, उनका बड़ा असर नौकरी, इंटरव्यू, दोस्ती, शादी जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर आजीवन पड़ता रहता है। यह महिला और पुरुष दोनों के लिए लगभग एक जैसा ही है। लेकिन आमतौर पर महिलाओं के खिलाफ ज्यादा है।

गोरे रंग को सुंदरता और गहरे रंग को बदसूरती से जोड़ कर देखने का जो चश्मा नजरों पर चढ़ा है, वह शायद एक दिन में नहीं हुआ। बचपन से ही माता-पिता बच्चों को त्वचा के रंग के नाम डराते और दुलराते रहते है। ‘धूप में मत खेलो, नहीं तो काले हो जाओगे’, ‘दूध पी लो, रंग गोरा हो जाएगा’ या ‘तुम्हारा फलां दोस्त कितना काले रंग का है’ कहते हुए उसे किसी भयानक उपमा से नवाज दिया जाता है। इस तरह, बचपन से ही बच्चों को त्वचा के रंगों में अंतर करना और उसका असर और अभिप्राय सिखा दिया जाता है जो आगे चल कर शिक्षा और नौकरी के दरमियान अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहता है। कभी किसी पर नस्लीय टिप्पणियों के रूप में तो कभी किसी के परोक्ष बहिष्कार के रूप में। उच्चस्तरीय शिक्षा और पद वाले लोग भी इस सबसे ऊपर नहीं हैं।

सवाल है कि क्या सांवला रंग काबिलियत या सुंदरता पर वाकई कोई बुरा प्रभाव डालता है! जाहिर है, इसका उत्तर साफ तौर पर ‘नहीं’ में है। भारत में हिंदू समाज कृष्ण और काली की पूजा करता आया है। लेकिन सांवले रंग वाले लोगों के प्रति हिकारत का भाव तब भी बना हुआ है। अगर रंग गुणों से अधिक महत्त्वपूर्ण होता तो आज हममें से बहुत सारे लोगों के लिए शायद कहीं कोई जगह नहीं होती। बड़े और जिम्मेवार पदों पर आसीन लोगों के गैर-जिम्मेदाराना बयानों ने ये सवाल नहीं पैदा किए, बल्कि यह तो बरसों से चली आ रही परंपरा है जो आज भी बनी हुई है। हां, यह जरूर है कि ऐसे बयान इनकी प्रासंगिकता को जरूर पुनर्जीवन दे देते हैं, जिसे समाज ने ‘ऐसा ही होता है’ और ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे वाक्यों के पीछे दबा कर रख दिया होता है। इन सवालों के जवाब कानून या संविधान की किताबों में खोजने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि वहां इनका जवाब बहुत पहले से दर्ज है। अब जरूरत है अपने भीतर झांकने की और अपने आसपास देखने की। यह विषय संविधान के दायरे से बाहर सामाजिक नैतिकता और मानसिकता का है। किसी भी परिवर्तन की शुरुआत बाहर से अंदर की तरफ नहीं, बल्कि अंदर से बाहर की तरफ ही हो सकती है।

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