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पवन रेखा यह समझना मुश्किल है कि दिल्ली में सोलह दिसंबर, 2012 को बलात्कार और हत्या की बर्बर घटना पर बने वृत्तचित्र ‘इडियाज डॉटर’ पर सरकार ने क्यों पाबंदी लगाई! इसके बावजूद जिस तरह बड़े पैमाने पर लोगों ने इसे खोज कर देखा, उसका श्रेय भी इस पाबंदी को ही दिया जाना चाहिए। जो हो, […]

Author March 10, 2015 10:15 PM

पवन रेखा

यह समझना मुश्किल है कि दिल्ली में सोलह दिसंबर, 2012 को बलात्कार और हत्या की बर्बर घटना पर बने वृत्तचित्र ‘इडियाज डॉटर’ पर सरकार ने क्यों पाबंदी लगाई! इसके बावजूद जिस तरह बड़े पैमाने पर लोगों ने इसे खोज कर देखा, उसका श्रेय भी इस पाबंदी को ही दिया जाना चाहिए। जो हो, न सिर्फ वृत्तचित्र में यह जाहिर हुआ है, बल्कि पाबंदी की कवायद ने समाज से लेकर सत्ता में पसरे पुरुष-प्रधान सोच को ही दर्शाया। इसे देख कर मेरे भीतर का वह दर्द एक बार फिर उभर आया, जिसे भूल कर मैं वहां से आगे बढ़ने की कोशिश में थी।

दुख इस बात का है कि एक ओर सरकार यह नारा देती है कि ‘नहीं होगा नारी पर वार’, दूसरी ओर वही वृत्तचित्र पर पाबंदी लगा देती है। दलील यह दी गई कि इसमें बलात्कारी का साक्षात्कार है। सवाल है कि उसके जिस बयान को आधार बना कर इस पर रोक लगाई गई, वह समाज में कहां नहीं पाया जाता! जावेद अख्तर ने पाबंदी का विरोध करते हुए ठीक ही कहा कि ‘मर्दों को पता तो चले कि वे बलात्कारी की तरह सोचते हैं!’ इस घटना के अपराधियों के वकीलों ने वृत्तचित्र में जो कहा, क्या वह कम आपत्तिजनक है? एक वकील ने इसमें बड़े गर्व से कहा कि अगर मेरी बहन या बेटी शादी के पहले ऐसा काम करती है तो मैं पूरे परिवार के सामने उस पर पेट्रोल डाल कर जला दूंगा।’ दूसरे वकील ने भी कहा कि अगर लड़कियां बिना पर्याप्त सुरक्षा के बाहर जाती हैं, तो बलात्कार की ऐसी घटनाएं होनी तय हैं। बलात्कारी मुकेश ने इसी से मिलती-जुलती बात कही कि ‘शरीफ लड़कियां रात में नहीं घूमती हैं… लड़कों से ज्यादा लड़कियां बलात्कार के लिए जिम्मेदार हैं।’ मुझे वकीलों और बलात्कारी के सोच में कोई फर्क नहीं लगता।

वकालत समाज के शिक्षित और संभ्रांत वर्ग का पेशा माना जाता है। लेकिन जिस देश में वकील ही इस तरह का शर्मनाक सोच रखते हों, वहां महिलाओं को मिलने वाले न्याय के हालात के बारे में सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। वृत्तचित्र पर पाबंदी लगाने वाली सरकार के कानों तक क्या इन वकीलों की आवाज नहीं पहुंची? वृत्तचित्र में जेल में बलात्कारियों के एक मनोचिकित्सक बताते हैं कि जेल में कुछ ऐसे अपराधी भी हैं जो बताते हैं कि उन्होंने दो सौ से ज्यादा बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया है, लेकिन उसे अब तक बारह बार ही सजा हुई। यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी अपराध में लिप्त व्यक्ति के मन में कितना डर होगा। वे यही सोचते हैं सरकार क्या कर लेगी। लेकिन आखिर वे ऐसा क्यों सोचते हैं? इतने बड़े आंदोलन के बाद भी निर्भया के दोषियों को सजा आखिरी तौर पर सुनिश्चित नहीं हो सकी है।

जिस घटना को लेकर पूरा देश सड़कों पर आ गया था, जब उसका ही अब तक उचित समाधान नहीं हुआ, तो बाकियों का क्या होगा! उलटे बलात्कार के अपराध में सजा की दर में लगातार गिरावट आती गई है। दरअसल, इस वृत्तचित्र को बनाने वाली लेसली उडविन ने महिलाओं के उस दर्द को बयान कर दिया है जो वे न जाने कब से अपने सीने में दबाए बैठी थीं। ऐसा करने की कोशिश शायद अब तक किसी ने नहीं की थी। इस हकीकत को देख कर जहां एक बार फिर हमारा दिल दहल जाता है, वहीं इसके पीछे का सच हमें रुला देता है। विवादों के बीच यह वृत्तचित्र मन में कई ऐसे सवाल छोड़ जाता है, जिनका जवाब हमें खुद ही ढूंढ़ना होगा।

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