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बीएड का बाजा

वर्षा हर वह चीज जो लड़कियों पर चरित्र प्रमाण पत्र की तरह चस्पां कर दी जाती हैं, मुझे उस पर बेहद गुस्सा आता। जैसे लड़कियां आर्ट्स लेती हैं, साइंस नहीं। मैंने साइंस ली। लड़कियां बायोलॉजी लेती हैं, गणित नहीं। तो मैंने गणित लेने की ठानी और सारे इम्तिहानों में पास भी हुई। हां, अगर आर्ट्स […]

Author April 4, 2015 11:10 PM

वर्षा

हर वह चीज जो लड़कियों पर चरित्र प्रमाण पत्र की तरह चस्पां कर दी जाती हैं, मुझे उस पर बेहद गुस्सा आता। जैसे लड़कियां आर्ट्स लेती हैं, साइंस नहीं। मैंने साइंस ली। लड़कियां बायोलॉजी लेती हैं, गणित नहीं। तो मैंने गणित लेने की ठानी और सारे इम्तिहानों में पास भी हुई। हां, अगर आर्ट्स के कुछ विषय पढ़े होते, इतिहास-भूगोल ज्यादा पढ़ा होता तो और अच्छा रहता। लेकिन विज्ञान भी मुझे प्रिय रहा। खासतौर पर भौतिकी, रसायनशास्त्र नहीं। स्नातक के बाद अपनी राह तलाश रही थी तो बीएड कर लो… बीएड करा दो जैसी सलाह नारे की तरह चारों ओर गूंजती। पड़ोस की आंटियां, अंकल, भइया- सबकी यही सलाह। सभी लड़कियां पढ़ाई करें और फिर वे बीएड कर लें। यह बात मुझे बहुत नागवार गुजरती। ‘बीएड किया है क्या’, यह सवाल मुझ पर तीर की तरह गुजरता।

लड़कियां बीएड करें, इससे मुझे कोई ऐतराज नहीं। शिक्षिका की नौकरी कुछ सुकून का पेशा होता है। इसमें परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी निभाने में सहूलियत रहती है। दूसरी नौकरियों में दिक्कत होती है। लेकिन दिक्कतों से जीवन में कहां तक बचा जा सकता है! जीवन में किस तरह की दिक्कतों और किस तरह की सहूलियतों का चुनाव किया जाए, यह आप पर है। ठीक है कि लड़कियां बीएड करना पसंद भी करती हैं। लेकिन इस पाठ्यक्रम को हर लड़की पर चस्पां कर देना भी तो ठीक नहीं! मां-बाप और उनकी पीढ़ी के लोगों को तो एकबारगी छोड़ ही दिया जाए। लेकिन हमारे दौर के लोग भी जब ये सलाह देते हैं तो मन गुस्से से भर जाता है।

नौकरी में जरा उठापटक हुई तो बीएड कर लो! नौकरी के दरमियान कुछ परेशानियां आर्इं तो उसका हल ये कि बीएड कर लो! किसी नौकरी के बारह-तेरह साल बाद भी लोग इस तरह की सलाह देने से गुरेज नहीं करते। ऐसी सलाह देने वालों में पुरुषों से आगे महिलाएं रहती हैं। मंगल अभियान समेत अंतरिक्ष अनुसंधानों में शामिल (महिला) वैज्ञानिकों की तस्वीर मेरे जेहन पर मिसाल के रूप में चस्पां हो गई है। मैं वैज्ञानिक टेसी थॉमस के तार्किक दिमाग के बारे में सोचती हूं जिन्होंने अग्नि परियोजना को अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उन्हें अग्निपुत्री कहा गया।

मैं दुनिया में लीक से हट कर काम कर रही लड़कियों-महिलाओं की बात पढ़ती-लिखती हूं। वह पहली महिला जिसने ट्रक ड्राइवर बनना पसंद किया, मैं उसकी हिम्मत की दाद देती हूं। अंतरिक्ष में उपस्थिति दर्ज कराने से लेकर पेट्रोेल पंप पर पेट्रोल डालती महिलाओं को मैं खासतौर पर रेखांकित करती हूं। पर ये बीएड का बाजा अपने यहां थमता नहीं। यह लिखते हुए मुझे अपने चाचा की बेटी की याद आ रही है। छोटे कस्बे की लड़की को पढ़ाने के लिए उसके मां-बाप ने उसे उसकी बुआ के पास रखा। वहां अच्छा स्कूल था, अच्छी पढ़ाई। बारहवीं तक लड़की अपनी मां के साथ नहीं, बुआ के साथ रही कि पढ़ाई कर ले। उसका एक रोज मेरे पास फोन आया। उसने कहा कि दीदी मुझे भी मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई करनी है। क्या करना होगा! मैंने इस बारे में उसे जानकारी दी। कुछ महीने बाद पता चला कि वह तो बीएड कर रही है। मैंने पूछा तो पता चला कि उसके चचेरे बड़े भाई की सलाह या निर्देश पर उसे बीएड में दाखिला दिला दिया गया। मुझे अफसोस हुआ। जिसकी पढ़ाई के लिए उसे बचपन में परिवार से दूर किया गया, उसका अंजाम अगर बीएड ही होना था तो उसी कस्बे में उसे पढ़ने देते। मैं तो यही कहूंगी कि लड़कियां जो करना चाहें, करें। बीएड से आगे दुनिया बहुत बड़ी है।

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