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असम की गद्दी

राजीव कुमार असम में अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होंगे। पिछले साल केंद्र की सत्ता में भारी बहुमत से आने के बाद भाजपा असम में भी अगली सरकार अपनी बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम की चौदह में से सात सीटें हासिल हुई थीं। […]

Author June 9, 2015 5:49 PM

राजीव कुमार

असम में अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होंगे। पिछले साल केंद्र की सत्ता में भारी बहुमत से आने के बाद भाजपा असम में भी अगली सरकार अपनी बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम की चौदह में से सात सीटें हासिल हुई थीं। उसे लगता है कि वह असम के मुद्दों को भुना कर सरकार बना लेगी। लेकिन पिछले एक साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने असम में किए गए अपने वादों से इतनी बार पलटी मारी है कि हर कोई हैरत में पड़ गया है। देखना यह है कि इसका असर असम की राजनीति पर क्या पड़ता है।

गौरतलब है कि असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का एलान किया था। पर भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरते देख उनमें फिर उत्साह आ गया लगता है। लगातार तीन बार सत्ता में आने के बाद वे राज्य के पहले सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं और अब उनकी नजर अगली सरकार बनाने पर है। वहीं भाजपा के पास अपनी आंतरिक उलझनें हैं, लोकसभा चुनाव के पहले किए गए वादों पर जवाब का अभाव है। मतदाताओं को ऐसा लगने लगा है कि भाजपा की कथनी और करनी में भारी अंतर है।

उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के साथ भूमि हस्तातंरण के मसले पर भाजपा ने सबसे बड़ी पलटी मारी। लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी की जनसभा में कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार ने आपसे पूछ कर यह समझौता किया था क्या! हम असम की एक इंच जमीन देने नहीं देंगे। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी गुवाहाटी आए तो उनके सुर बदल गए। उन्होंने कहा कि असम के फायदे के लिए जो होगा, वहीं करेंगे। अगर सीमा विवाद हल हो जाता है तो सीमा पूरी तरह सील करने में मदद मिलेगी, घुसपैठ बंद होगी। यही बात थी तो यूपीए ने जब समझौता किया था तो उसके विरोध में भाजपा क्यों उतरी थी? क्या यह सब सिर्फ वोट की राजनीति के लिए किया जाता है?

भाजपा का दूसरा बड़ा यू-टर्न सुवनसिरी पनबिजली परियोजना को लेकर था। लोकसभा चुनाव के दौरान इस परियोजना के खिलाफ आंदोलन कर रहे संगठनों और जनता को आश्वस्त करते हुए भाजपा ने कहा कि हम बड़े बांध के खिलाफ हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद अब भाजपा का कहना है कि विकास के लिए बिजली जरूरी है। इसे हम हर हाल में करेंगे। यही नहीं असम का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने के साथ ही नब्बे अनुपात दस से जो राशि मिलती थी, उसका पैमाना बदल कर पचास-पचास कर दिया गया। विभिन्न केंद्रीय योजनाओं की राशि में कमी की गई। इसके अलावा, भाजपा के पास विधानसभा के चुनाव में खड़े होने के लिए ढंग के उम्मीदवार नहीं हैं। इसलिए वह अन्य पार्टियों के विफल नेताओं को भी अपनी पार्टी में ले रही है। हालांकि अगर इनके बलबूते भाजपा सरकार में आने की सोच रही है तो यह शायद उसकी भूल है।

फिलहाल भाजपा अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रियों को असम आने का निर्देश दे चुकी है। हर समय एक न एक केंद्रीय मंत्री असम में मौजूद रहता है। अपने मंत्रालय के यहां चल रहे कार्यों की समीक्षा करने के साथ ही वे केंद्रीय मंत्री जाते-जाते गोगोई सरकार पर आरोप लगा जाते हैं कि केंद्र की ओर से दी गई राशि का सदुपयोग नहीं हुआ है। चुनाव के पहले आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति जारी है। भाजपा के आरोपों का जवाब देने के साथ ही गोगोई नई योजनाओं का एलान कर रहे हैं। पुरानी पड़ी बंद योजनाओं को फिर से चालू किया जा रहा है। मतदाताओं को लुभाने की कोशिश चल रही है। इन हालात में भाजपा के लिए आने वाला विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा।

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