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अनुभव का रिश्ता

मनोज कुमार समूचा सामाजिक ताना-बाना रिश्तों से ही बना और गुंथा हुआ है। ऐसा लगता है कि समाज के जन्म के साथ ही रिश्ते टूटने को लेकर बिसूरने का सिलसिला शुरू हो गया होगा। इन विचारों को लेकर जब अपने दोस्त से बात की तो वह भी रिश्तों के टूटन से दुखी नजर आया। उसके […]

Author January 26, 2015 16:16 pm

मनोज कुमार

समूचा सामाजिक ताना-बाना रिश्तों से ही बना और गुंथा हुआ है। ऐसा लगता है कि समाज के जन्म के साथ ही रिश्ते टूटने को लेकर बिसूरने का सिलसिला शुरू हो गया होगा। इन विचारों को लेकर जब अपने दोस्त से बात की तो वह भी रिश्तों के टूटन से दुखी नजर आया। उसके पास यही जवाब था कि समय बुरा आ गया है, क्या करें, कुछ नहीं कर सकते हैं! मेरा दोस्त अजीज है और मैं उसका यह जवाब सुन कर स्तब्ध रह गया। सब यही कहेंगे तो अच्छा समय आएगा कब?
क्या राजनीति के अच्छे दिनों वाले झूठे राग से समय बदल जाएगा? शायद नहीं। दरअसल, हर अच्छे समय के लिए अच्छे प्रयासों की जरूरत होती है। अंग्रेजों की दासता से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते, लेकिन महात्मा गांधी ने शुद्ध मन से प्रयास किया और हम स्वाधीन हैं। गांधीजी और उनके साथ के लोग कहते कि ‘क्या कर सकते हैं’ तो शायद आज भी हम पराधीन ही होते। बहरहाल, रिश्तों और समय को बदलने की बात को लेकर मैं नाउम्मीद नहीं हूं। थोड़े सोच और समझ के साथ दोनों को बदला जा सकता है। यह इसलिए भी संभव है कि आप अपनी जरूरतों के अनुरूप नई तकनीक का इस्तेमाल करना सीख सकते हैं तो रिश्तों को नया स्वरूप देने के लिए अपनी जरूरत क्यों नहीं बनाते!

रिश्तों में टूटन सबसे ज्यादा बुजुर्ग लोगों के साथ देखने में आती है और इसका इलाज हमने वृद्धाश्रम के रूप में ढूंढ़ लिया है। रिश्ते दो तरह के माने गए हैं। पहला खून का रिश्ता और दूसरा दिल का। इससे आगे समझने की कोई कोशिश हुई ही नहीं। एक तीसरे किस्म के रिश्ते से रिश्तों को नए ढंग से परिभाषित किया जा सकेगा। इसे मैं अनुभव का रिश्ता कहता हूं। जो लोग अपनी उम्र जी चुके हैं और एक तरह से हमारे जीवन में उनकी कोई उपयोगिता नहीं मानी जाती है, क्या उनसे हम अनुभव का रिश्ता नहीं बना सकते हैं। ऐसे बुजुर्ग, जिन्होंने अपने जीवन में कई बड़े काम किए, लेकिन अवकाशप्राप्ति के साथ ही वे बेकार हो गए। हमने भी मान लिया कि सेवानिवृत्ति के बाद आदमी अनुपयोगी हो जाता है। शायद शारीरिक तौर पर वह पहले जैसा काम न कर सके, मगर बुद्धि के स्तर पर तो आदमी सशक्त होता ही है। ऐसे लोगों को शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग में लाया जा सकता है। कोई लेखा का काम जानता है तो किसी के पास बेहतर प्रबंधन क्षमता है। किसी को गणित में महारत हासिल है, तो किसी के पास विज्ञान की समझ है। क्यों न हम अपने बच्चों को महंगे कोचिंग संस्थानों में भेजने के बजाय इन अनुभवी लोगों का उपयोग करें! उम्र के इस पड़ाव में इन्हें धन नहीं, सम्मान की जरूरत होती है। और जब उनके अनुभवों को एक मंच मिलेगा तो ये लोग वृद्धाश्रम से मुक्त होकर बेकार के बजाय उपयोगी हो जाएंगे। कुछ घरों में इन बुजुर्गों को इसी तरह का सम्मान मिल रहा है। अनुभवों का जो हम लाभ प्राप्त करेंगे, उससे समाज में अनुभव का एक नया रिश्ता बनेगा और समय भी बदल जाएगा। हम अपने बड़ों को सम्मान देने के सांचे में खुद को ढाल सकेंगे। एक बार आप अपने घर, परिवार, मोहल्ले में अनुभव का रिश्ता बनाने की शुरुआत करके देखिए! आपके घर की बगिया में कोई मुरझाया हुआ फूल नहीं, बल्कि घना छायादार बरगद का पेड़ होगा जो न केवल आपको छांव देगा, बल्कि मन को प्रसन्न रखेगा।

 

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