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अंत और अनंत

अंकित मुत्त्रीजा केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद से जिस तरह गांधीजी को परोक्ष रूप से निशाना बनाया जा रहा है, वह अप्रत्याशित है। हालांकि खुद कांग्रेस के लिए भी महात्मा गांधी के दिखाए रास्तों पर चलना तो दूर, उनकी चर्चा रस्म-अदायगी बन चुकी थी। लेकिन भाजपा के राज में आज साबरमती का […]
Author January 1, 2015 16:30 pm

अंकित मुत्त्रीजा

केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद से जिस तरह गांधीजी को परोक्ष रूप से निशाना बनाया जा रहा है, वह अप्रत्याशित है। हालांकि खुद कांग्रेस के लिए भी महात्मा गांधी के दिखाए रास्तों पर चलना तो दूर, उनकी चर्चा रस्म-अदायगी बन चुकी थी। लेकिन भाजपा के राज में आज साबरमती का संत ही शायद सबसे मजबूत विपक्ष बनता जा रहा है! भाजपा सांसद साक्षी महाराज, आरएसएस का केरल से निकलने वाला मुखपत्र, मुंबई में विहिप की महासभा में साध्वी सरस्वती के हमले कुछ बानगी भर हैं। सुनियोजित ढंग से राष्ट्रपिता की छवि को अपनी सहूलियत के अनुकूल नायक या खलनायक में बदल कर नए तरीके से पेश किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेशक देश और विदेश में महात्मा गांधी का गुणगान करते दिख रहे हैं, लेकिन उनकी सरकार से जुड़े अधिकतर समर्थकों, मंत्रियों, नेताओं का सोच छिपा नहीं है।

दरअसल, महात्मा गांधी ने जब भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था, तभी से हिंदुत्व की राष्ट्रवादी राजनीति और अभिजात वर्ग को उनसे कड़ी चुनौती मिली। बापू ने यूरोपीय राष्ट्रवाद की शहरी और अर्ध-शहरी लोकप्रियता को तोड़ते हुए देश के दिल देहातों में दस्तक दी थी। अपने एजेंडा की रूपरेखा पेश करते हुए उन्होंने पहली दफा ही कांग्रेस अधिवेशन में अपने भाषण के दौरान कांग्रेस के राजनीतिक आंदोलन को दिल्ली और मुंबई की शहरी राजनीति बता कर संगठन की किरकिरी कर दी थी। इस गांधी से शुरुआती दौर में कांग्रेस के अभिजात तबके तक को चुनौती पेश आई थी, पर गांधी के सिवा कांग्रेस के पास दूसरा विकल्प नहीं था। दूसरी तरफ, अपने दौर के उफान पर पहुंचे हिंदू राष्ट्रवाद के अधिकतर नेता भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधिता से कटे हुए थे, इसलिए उनके कुनबे में हड़कंप स्वभाविक था। बापू ने जिस सेक्यूलर भारत के ताने-बाने को बुनना शुरू किया था, उसमें वर्चस्व का तत्त्व मौजूद नहीं था।

संघ परिवार के कारकुन अक्सर गांधी की हत्या को ‘वध’ कहते हैं और विश्व की मानवता के सबसे बड़े ज्योतिपुंज महात्मा गांधी की हत्या पर ‘शौर्य दिवस’ तक मनाते हैं। गोड्से को राष्ट्रभक्त साबित करने के लिए अपने फार्मूले पर अमल करते हुए साजिशन इतिहास को मनचाहे तरीके से पेश करके राष्ट्रवादियों की बिग्रेड गांधी पर विभाजन की तोहमत मढ़ती है। जबकि हकीकत यह है कि गोड्से ने जो किया, वह राष्ट्रप्रेम नहीं, हिंदुत्ववाद की राजनीति थी, जिसे गांधी से भय था।

इतिहास गवाह है कि गांधी ने बंटवारे को रोकने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया। उन्होंने भारत के आखिरी वायसराय, नेहरू, जिन्ना तक को साफ लफ्जों में कह दिया था कि मुल्क का बंटवारा मेरी लाश पर ही मुमकिन होगा। यहीं से बापू हाशिये पर धकेल दिए गए, क्योंकि साम्राज्यवादी ताकतें अपने दांव पहले ही चल चुकी थीं। फिर भी बापू ने दंगों की आग से झुलसते मुल्क को मरहम लगाने का काम किया। दिल्ली में दंगों की आग इतनी भयावह थी कि ‘आधी रात को आजादी’ पुस्तक के मुताबिक नेहरू और पटेल ने लुईस माउंटबेटन के आगे स्थिति पर काबू पा सकने में असमर्थता जता दी थी। मगर साबरमती के लाल ने माहौल बिगाड़ने वाले तमाम संगठनों (पुस्तक के मुताबिक इसमें आरएसएस भी शामिल रहा) को काबू में करते हुए ऐसा सौहार्द बनाया कि दिल्ली की जामा मस्जिद में कौमी एकता का नजारा उस वक्त कइयों को चौंकाता था। फिर भी राष्ट्रवाद का अफीम बेच रहे ब्रिगेड बापू की छवि को धूमिल करने में लगे रहे।

आज का राष्ट्रवाद भी भीतर से पूरी तरह खोखला है। इसीलिए यह जल, जंगल, जमीन की बात करने से कतराता है, कश्मीर की समस्याओं पर बात करने से हिचकता है, नक्सलवाद जैसी समस्या का राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण कर उसका सरलीकरण करता है। इस देश की सांस्कृतिक, सामाजिक विविधता की बुनावट का सूत्रीकरण हिंदू राष्ट्र के रूप में करने की नासमझी करता है। शायद इसीलिए इस राष्ट्रवाद को बापू से भय लगता है। यह ध्यान रखा जाए कि गोड्से अंत है और गांधी अनंत हैं!

 

 

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