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अक्षय ऊर्जा

प्रदीप कुमार सूर्य पृथ्वी से लगभग पंद्रह करोड़ किलोमीटर दूर है। हालांकि अन्य तारों की अपेक्षा सूर्य हमसे बहुत नजदीक है, इसलिए हमें बहुत शक्तिशाली प्रतीत होता है। सूर्य से संबंधित हमारे मस्तिष्क में अनेक कौतहूलपूर्ण सवाल उठते हैं, मसलन यह कैसे चमकता है, कैसे इतनी अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करता है, आखिर सूर्य […]

Author March 16, 2015 10:31 AM

प्रदीप कुमार

सूर्य पृथ्वी से लगभग पंद्रह करोड़ किलोमीटर दूर है। हालांकि अन्य तारों की अपेक्षा सूर्य हमसे बहुत नजदीक है, इसलिए हमें बहुत शक्तिशाली प्रतीत होता है। सूर्य से संबंधित हमारे मस्तिष्क में अनेक कौतहूलपूर्ण सवाल उठते हैं, मसलन यह कैसे चमकता है, कैसे इतनी अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करता है, आखिर सूर्य के अंदर ऐसा कौन-सा र्इंधन है जो जल रहा है? होउटरमैंस और अटकिंसन नामक दो वैज्ञानिकों ने यह प्रस्ताव रखा था कि ‘ताप-नाभिकीय अभिक्रियाएं’ ही सूर्य और अन्य तारागणों में ऊर्जा के स्रोत हैं। सन 1939 में वाइसजैकर और हैंस बेथे नामक दो वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से शोध के बाद यह व्याख्या दी कि सूर्य और अन्य तारों में होने वाली ताप-नाभिकीय अभिक्रियाओं के कारण हाइड्रोजन का दहन होकर हीलियम में परिवर्तन हो जाता है (संलयन)।

सूर्य और अन्य तारों में हाइड्रोजन सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला संघटक है और ब्रह्मांड में भी इसकी सर्वाधिक मात्रा है। अगर हम हाइड्रोजन के चार नाभिकों को जोड़ें, तो हीलियम के एक नाभिक का निर्माण होता है। हाइड्रोजन के चार नाभिकों की अपेक्षा हीलियम के एक नाभिक का द्रव्यमान कुछ कम होता है। इन सबके पीछे 1905 में आइंस्टीन द्वारा प्रतिपादित ‘विशेष सापेक्षता सिद्धांत’ का प्रसिद्ध समीकरण ‘ई = एमसी 2’ है। इस समीकरण के अंतर्गत द्रव्यमान ऊर्जा का ही एक रूप है। द्रव्यमान ‘ई’ ऊर्जा की एक मात्र ‘ए’ के तुलनीय हैं। यानी उपर्युक्त ताप-नाभिकीय संलयन में हीलियम के द्रव्यमान में जो कमी हुई थी, वह ऊर्जा के रूप में वापस मिलेगा। इसी कारण से सूर्य और अन्य तारे चमकते हैं।

मजेदार तथ्य यह है कि सभी तारे अपना हाइड्रोजन एक ही प्रकार से खर्च नहीं करते हैं। जो तारा जितना बड़ा है, उतना ही अधिक तेजी से हाइड्रोजन खर्च करता है और जो सूर्य से दो गुना बड़े हैं, वे अपना हाइड्रोजन दस गुना तेजी से खर्च कर रहे हैं।
जो तारे सूर्य से दस गुना बड़े हैं, वे एक हजार गुना तेजी से। ऐसे तारे काफी कम समय में ही अपना हाइड्रोजन समाप्त कर देते हैं और मृत्यु की कगार पर पहुंच जाते हैं। जो तारे सूर्य के आकार के हैं, उनका हाइड्रोजन काफी लंबे समय तक चलता है।

तारों की जीवन यात्रा के संबंध में चर्चा करते हुए यह जानना जरूरी है कि मनुष्य ने सन 1950 के बाद हाइड्रोजन बम निर्माण करने का ज्ञान प्राप्त किया है। हाइड्रोजन बम आकार में अधिक बड़ा नहीं होता है। यों कहें कि दस लाख टीएनटी क्षमता वाले हाइड्रोजन बम को एक साधारण बिस्तर में छिपाया जा सकता है। हाइड्रोजन बम का विमोचक(ट्रिगर) ही आमतौर पर परमाणु बम की क्षमता के बराबर होता है। इस बम से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा दरअसल ताप-नाभिकीय अभिक्रियाओं के ही कारण होती है।

इसका मतलब यह है कि सूर्य और अन्य तारों में प्रतिदिन हजारों हाइड्रोजन बम फूटते हैं। पर तारों के अंदर होने वाली ताप-नाभिकीय प्रक्रियाएं विस्फोटक रूप में न होकर संतुलित रूप में होती हैं। संलयन को संतुलित रूप में करवाने में अभी पृथ्वीवासी सफल नहीं हुए हैं। अगर मानव ‘संलयन भट्ठी’ बनाने में सफलता प्राप्त कर लेगा तो हम धरती पर ही कृत्रिम वामन तारों का निर्माण कर सकेंगे। लेकिन इस समय चिंताजनक विषय यह है कि मानव हाइड्रोजन बम जैसी युक्तियों का उपयोग विनाशक और संहारक आयुधों के निर्माण में निरंतर प्रयासरत रहा है और इसमें सफल भी रहा है। हालांकि फिलहाल यह राहत की बात है कि अभी तक हाइड्रोजन बम का किसी युद्ध में प्रयोग नहीं किया गया है।

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