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चश्मे की फिक्र

अशोक उपाध्याय सन 2010 में सलमान खान की फिल्म ‘दबंग’ आई थी। इस फिल्म में नायक सलमान खान पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में थे। बॉक्स आॅफिस पर यह सफल फिल्म मानी गई। बाद में इस फिल्म की अगली कड़ी भी बनी। इसमें सलमान खान ने अपनी एक पहचान के तौर पर धूप का काला चश्मा […]

Author June 2, 2015 2:14 PM

अशोक उपाध्याय

सन 2010 में सलमान खान की फिल्म ‘दबंग’ आई थी। इस फिल्म में नायक सलमान खान पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में थे। बॉक्स आॅफिस पर यह सफल फिल्म मानी गई। बाद में इस फिल्म की अगली कड़ी भी बनी। इसमें सलमान खान ने अपनी एक पहचान के तौर पर धूप का काला चश्मा लगाया था। यह नायक की एक खास शैली थी। चश्मे के दोनों शीशे पर दिल के निशान बने थे। उसी चश्मे से वह अपनी अदाकारी बिखेरते हुए नायिका को देख कर मुस्कराता था। इसके अलावा, गुंडों से मारपीट करते समय वह इस चश्मे को अपनी कमीज के कॉलर के पीछे फंसा लेता था। फिल्मी शैली में गुंडों की पिटाई करने के बाद अदा से उसे फिर पहन लेता था। फिल्म में पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में सलमान का इस तरह काला चश्मा पहनना और कॉलर के पीछे लटकाना फिल्म की जान थी।

दिलचस्प यह है कि ‘दबंग’ ने न सिर्फ आम जनता का खूब मनोरंजन किया, बल्कि जिस तरह की खबरें छपीं, उसके मुताबिक यह देश के नेताओं को भी बहुत पसंद आई थी। मध्य भारत के एक मुख्यमंत्री ने तो पुलिसकर्मियों को संबोधित करते हुए कहा था कि पुलिस को एक फिल्म के नायक ‘सिंघम’ की तरह काम करना चाहिए। उसे किसी से डरना नहीं चाहिए। बिहार के कुछ नेताओं को ‘दबंग’ फिल्म बहुत पसंद आई थी। इसका कारण यह था कि फिल्म का नायक जो पुलिस इंस्पेक्टर है, कानून की बहुत ज्यादा चिंता नहीं करता है। वह रॉबिनहुड की शैली में खुद ही न्याय करता है। अब हाल में सलमान खान की तरह चश्मा पहने छत्तीसगढ़ में जगदलपुर के कलक्टर प्रधानमंत्री के स्वागत में खड़े हो गए। प्रधानमंत्रीजी को यह नागवार गुजरा या नहीं यह तो नहीं मालूम, मगर उन्हीं की पार्टी के और राज्य के मुख्यमंत्री को यह नागवार गुजरा। उन्होंने कलक्टर को चेतावनी जारी करवा दी कि उन्हें माननीय लोगों के सामने बंद गले का कोट पहनना चाहिए और जैसा हीरो लोग चश्मा पहनते हैं, वैसा चश्मा नहीं पहनना चाहिए; अदब से आदेश का पालन करना चाहिए।

फिल्म में जब पुलिस वाले नियम-कानूनों से ऊपर उठ कर किसी दूसरे पात्र के साथ मार-धाड़ करें तो उन्हें अनुकरणीय मान लिया जाता है। राजनेता कानून से ऊपर जाकर काम करने के लिए प्रेरित करने से भी परहेज नहीं करते। जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है तो वहां पुलिस को पहले ही विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 के अंतर्गत असीम अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन अगर कोई पुलिस अधिकारी और प्रशासन के लोग नेताओं के सामने चश्मा पहन कर भी खड़े हो जाएं तो उन्हें बर्दाश्त नहीं होता। उसे भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दे दी जाती है। हालांकि लोकसेवक खुद कितने नियमों का पालन करते हैं, यह हम सब जानते हैं। लेकिन ये तो सबको अपने सामने हाथ बंधे, सिर झुकाए, आदेश मानने को तत्पर सेवकों की फौज देखना चाहते हैं। चूंकि कलक्टर सरकारी नौकर है तो उसे फरमान पकड़ा कर नेताओं को शायद कुछ राहत मिली होगी। यह बिल्कुल साफ नहीं है कि बंद गले का कोट न पहनना या काला चश्मा पहनना किसी तरह का विरोध था या कोई अवज्ञा। मगर इस एक घटना से नेताओं की सहनशीलता के स्तर का पता पूरे देश को चल गया।

ऐसे में यह सोचने की बात है कि जब अधिकारी इनका कहा नहीं मानते होंगे या जनता इनकी सभाओं में नहीं आती होगी या वोटर इन्हें वोट नहीं डालता होगा, उस वक्त इन्हें कैसा लगता होगा! लेकिन भीतर से परेशान हो जाने के बावजूद वे शायद कुछ करने की स्थिति में नहीं होते होंगे।

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