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श्रद्धा उपाध्याय प्रिय अरविंद, मेरा खुदा जानता है कितना कुछ टूटा है मेरे अंदर इन शब्दों को लिखने के लिए। आज शायद मेरी या मेरे शब्दों की कोई कीमत नहीं होगी पर मैं बोलूंगी, क्योंकि इस आंदोलन ने मुझे यही सिखाया है। गलत पर चुप ही रहना था तो क्यों ईमानदारी की मशाल लेकर मोर्चे […]

Author March 9, 2015 10:10 PM

श्रद्धा उपाध्याय

प्रिय अरविंद, मेरा खुदा जानता है कितना कुछ टूटा है मेरे अंदर इन शब्दों को लिखने के लिए। आज शायद मेरी या मेरे शब्दों की कोई कीमत नहीं होगी पर मैं बोलूंगी, क्योंकि इस आंदोलन ने मुझे यही सिखाया है। गलत पर चुप ही रहना था तो क्यों ईमानदारी की मशाल लेकर मोर्चे निकालते!

कितना अजीब है न सर, हफ्ते भर पहले तक आप पर उठे सवालों का जवाब दिया करती थी। जब भी श्रद्धा के नीचे आम आदमी पार्टी लिखती थी तो फिर-फिर अपनी पहचान से पहचान होती थी। इ-मेल टीम का हिस्सा रही हूं, इसलिए जानती हूं कि कितना मुश्किल होता है अजीबोगरीब चिट्ठियों के जवाब देना। पर आपने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा।

उन लाखों बेनाम चेहरों में से एक ‘कोई नहीं’ हूं, जिसने आपकी पुकार पर जो भी अपना हुआ करता था उसे छोड़ने का लोहा रखा। सड़कों पर उतरे, घरों से निकले, दुनिया के लिए दुनिया से मोह तोड़ा। इन चार सालों में अपना कुछ सोचा ही नहीं। पार्टी के साथी ही दोस्त रहे, परिवार रहे और पार्टी के सिद्धांत ही राह रहे और मंजिल भी। आज आपने ऐसे अनाथ किया है कि सब धुंधला-सा दिखता है। खुद से ज्यादा उन साथियों की फिक्र है आज जिन्होंने परीक्षाएं छोड़ीं, नौकरियां छोड़ीं, घर-परिवार छोड़े। आपके नेतृत्व में हम भ्रष्टाचारमुक्त भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे। आप लोगों के कदमों की छाप को अपनी राह माना था।

मेरी उम्र जन्मदिनों से नहीं, चुनावों से बढ़ रही थी। संघर्ष सतत चल रहा था बाहर भी और अपने अंदर भी। दिल्ली जीतने के उपरांत तो दुनिया रोशन हो गई थी, हमने अपनी जिंदगी का खाका चुनावी तौर पर तैयार कर ही लिया था। फिर अचानक ही पार्टी की सड़न बाहर आने लगी। इस मतभेद की सभी को खबर थी, पर सब कुछ ऐसे बिखर जाएगा, ये कब सोचा था हमने। और भी कई समझौते देखे पर उस गंतव्य के वास्ते उनको कई बार नजरअंदाज करते रहे। पर आज जब हर बांध टूट गया है तो हम भी किसी राजनीतिक कॉरपोरेशन के कर्मचारी बन कर नहीं रहना चाहते। हम यहां एक नई राजनीति के लिए आए थे, सत्ता के लिए नहीं। खैर, मुझे फख्र है कि मैंने अपने सिद्धांतों के लिए आवाज उठाई, तब भी और अब भी।

हम भी शायद आज या कल चले जाएंगे, आप किन्हीं बिकाऊ आत्माओं पर तानाशाही चला लीजिएगा! पर जाते-जाते कुछ सवाल हैं, उनका जवाब दे दीजिए। अरविंद की क्या छवि लेकर जाएं, बता दीजिए? सर, आप हमारे परिवार के परवरदिगार हैं। अपने ही अपनों पर कीचड़ से घाव कर रहे थे, आपने कुछ क्यों नहीं बोला? सर, पार्टी का संविधान मैं आज अपने लैपटॉप से डिलीट कर दूं क्या? सर, स्वराज भी क्या राजनीतिक जुमला था? आपने तो कहा था कि हम राजनीति को पवित्र कर देंगे! आपने ये कौन-से दलदल में फेंक दिया? ऐसा क्या हो गया कि आपका अंबर भी दागदार हो गया? गलत तो हम सभी हैं, पर सजा सिर्फ उनके हिस्से क्यों आई? इतना पक्षपाती तो कोई और कानून भी नहीं।

और इस पब्लिक एक्जिक्यूशन का क्या अर्थ निकाला जाए? सर, मैंने हमारे लिए कई लड़ाइयां लड़ी हैं पर इस बार मैं हार गई। मुझे कुछ भी मलाल नहीं है पर इस टीस का क्या करूं? ‘पांच साल केजरीवाल’ में कुछ सेकेंड तो हमारे भी होंगे! उनके हवाले से ही सही, कोई जवाब तो दे दीजिए! खैर, नजरों से तो बहुत कुछ उतर गया पर दिल से नहीं उतरता। आज भी आपके बारे में कुछ सुनना गवारा नहीं होता। प्लीज, हमें इस विरोधाभास से आजाद कर दीजिए।

मेरी ओर से आपको शुभकामनाएं, आप और आपके लोग प्रधानमंत्री बनें, मुख्यमंत्री बनें, दुनिया की सरपरस्ती करें पर जिस तरह आप बढ़े, आप बढ़े नहीं, बहुत-बहुत घट गए।

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