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वह थक गया था

मनीष ‘शून्य’ मुझे उसके इतनी जल्दी मरने की उम्मीद नहीं थी। हां, उसका कम उम्र में मरना तो उसी दिन तय हो गया था, जब उसने जन्म लिया था। उसके मां-बाप हमारे गांव के खेतों में काम करके अपना जीवन काट रहे थे। वे लोग बिहार से यहां आए थे। अब दिल्ली के किसान खेतों […]

Author June 23, 2015 5:06 PM

मनीष ‘शून्य’

मुझे उसके इतनी जल्दी मरने की उम्मीद नहीं थी। हां, उसका कम उम्र में मरना तो उसी दिन तय हो गया था, जब उसने जन्म लिया था। उसके मां-बाप हमारे गांव के खेतों में काम करके अपना जीवन काट रहे थे। वे लोग बिहार से यहां आए थे। अब दिल्ली के किसान खेतों में काम करना कहां पसंद करते हैं! नई-नई गाड़ियां खरीदने से ही फुर्सत नहीं है उन्हें। यहीं उसका जन्म हुआ था। जन्म देने के दो दिन बाद ही उसकी मां माया खेतों में काम करने लगी थी। बच्चे का नाम बलराम रखा गया। उसे माया या तो पेड़ पर कपड़ों के छोरों को बांध कर बनाए गए झूले पर सुला देती या फिर अपनी बेटी रानी को दे देती, उसका ध्यान रखने के लिए। रानी खुद तीन साल की थी। इतनी छोटी उम्र में ही वह एक मां की जिम्मेदारियां निभाने लगी थी।

वक्त बीतता गया। बलराम बड़ी तेजी से बढ़ने लगा। वह अपनी उम्र के बाकी सभी बच्चों से बहुत अलग था। उसे ठंड, गरमी या बारिश के असर से शायद ही कभी बीमार देखा गया हो। मिट्टी में खेल-खेल कर न जाने कब वह खेतों में काम करने लगा। फिर शाम में अपने पिता के साथ बाजार जाता सब्जी बेचने। वह स्कूल नहीं जाता था, लेकिन उसका हिसाब बड़ा सटीक था। वह किसी खेल अकादमी में भी नहीं जाता था, लेकिन अपने साथ के सभी बच्चों से तेज दौड़ता था। और रात को खेतों में पानी भी दे देता था, बिना किसी डर के।

जब हमारे बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे होते थे, वह सब्जी मंडी से वापस आ चुका होता था। हम अपने बच्चों को उससे दूर ही रखते थे। लोग कहते हैं कि उसे बोलने की तमीज नहीं थी, न वह अच्छे कपड़े पहनता था। महज छह वर्ष की उम्र में वह गुटका और पान मसाला चबाने लगा था। खैर, उस साल उनकी फसल अच्छी नहीं हुई। बलराम ने एक टेंट हाउस में काम करना शुरू कर दिया। दिन में अलग-अलग समारोहों के टेंट लगाता और शाम को उसी में वेटर का काम करता। वहीं उसकी उम्र के बच्चे डीजे की धुन पर पर नाचते, मिक्की माउस पर कूदते और आराम से कुर्सी पर बैठ कर आइसक्रीम खाते, जो बलराम उन्हें लाकर देता था।

पता नहीं कैसे हुआ कि बड़ा कठोर दिल हो गया था बलराम का। उसने इतनी जल्दी अपने बचपन का गला घोंट दिया था या उसमें हमारी कोई चूक थी! एक दिन सुनने में आया कि बलराम एक शादी के समारोह में चोरी करता पकड़ा गया। कॉफी का एक पैकेट चुराया था उसने। लोगों ने उसे जी-भर के पीटा। उन्होंने भी मारा, जो खुद थोड़ी देर पहले बलराम के पिता की सब्जी की दुकान से पॉलिथीन में सब्जी चुरा के ले गए थे। उसे कोई भी पीट सकता, क्योंकि नाम बलराम रखने से किसी के पास बल नहीं आ जाता। वह तो विरासत में मिलता है। इसके बाद वह एक कोने में पड़ा रोता रहा, किसी ने पूछ लिया कि तूने चोरी क्यों की? बलराम ने कहा कि मालिक कहता है, ऐसा करने को। ये सुन कर उसके मालिक ने बलराम के पेट में कई लातें जमा दीं। …और बलराम मर गया! वह शायद बहुत थक चुका था इस समाज से!

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