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मनसुख की बात

देवेंद्र सिंह सिसौदिया मनसुख कभी अनियमित बरसात तो कभी अतिवृष्टि से त्रस्त था। कोई उससे उसके मन की बात जानना नहीं चाहता है। उसके एक किसान साथी ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। हर कोई अपनी बात कह जाता था। क्या उसका मन नहीं है? क्या उसके मन में कोई बात नहीं आती और […]

Author May 18, 2015 8:47 AM

देवेंद्र सिंह सिसौदिया

मनसुख कभी अनियमित बरसात तो कभी अतिवृष्टि से त्रस्त था। कोई उससे उसके मन की बात जानना नहीं चाहता है। उसके एक किसान साथी ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। हर कोई अपनी बात कह जाता था। क्या उसका मन नहीं है? क्या उसके मन में कोई बात नहीं आती और क्या उसे अपने मन की बात बताने का कोई अधिकार नहीं है? मैंने सोचा, चलो हम ही इसके मन की बात सुन लेते हैं, ताकि इसका मन थोड़ा हलका हो जाए और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उसका भरोसा बना रहे। हम उसके करीब पहुंचे। मनसुख कुछ कहता, उसके पहले ही उसकी आंखों के पानी ने बयान कर दिया कि उसे कितनी खुशी हुई कि कोई तो है जो उसके मन की बात को समझने का प्रयास कर रहा है।

मनसुख ने अपनी जेब से एक कार्ड निकाला और कहा कि साहब, इसे जॉब कार्ड कहते हैं। इसी से हमें काम मिलता है। कई बार मैं इसे लेकर काम मांगने गया, लेकिन वे कहते हैं कि यह फर्जी है। भागो नहीं तो पुलिस के हवाले कर देंगे। बताइए साहब, मैं क्या करूं! मेरा तो वोट कोई और डाल गया था और काम भी कोई और मेरे नाम पर कर लेता है। मनसुख कुछ बता रहा था कि इस बीच उसकी पत्नी भी आ गई। कहने लगी कि साहब, एक तो रोजगार नहीं है और दूसरी तरफ कई दिनों से राशन की दुकान भी नहीं खुली है। ठेकेदार से पूछो तो कहता है कि ऊपर से पैसा नहीं आया है। बताओ साहब, भूख भी क्या किसी का इंतजार करती है? पता नहीं, हमारा पैसा कहां जाता है? सरपंच साहब से हमने यह बात कही थी। वे गांव के लोगों की बात लेकर बड़े अफसरों से मिलने शहर गए थे। शहर से आकर उन्होंने हम सब लोगों का मुंह मीठा करवाया था।

साहब, सरकारी स्कूल के ताले ही नहीं खुलते! ऐसे में हमारे बच्चों का भविष्य खराब हो रहा था। उसकी चिंता हमें खाए जा रही थी। तभी आप जैसे किसी साहब ने बताया कि तुम गांव के प्राइवेट स्कूल में ‘शिक्षा के अधिकार’ के तहत बच्चों का दाखिला क्यों नहीं करवा देते! गरीब बच्चों को फीस भी नहीं देना पड़ता। हमने हिम्मत कर वहां आवेदन किया था। लेकिन हमारे अधिकारों पर वहां भी अतिक्रमण हो गया और मालिक के बच्चे का दाखिला हो गया साहब। यह कहते हुए मनसुख की पत्नी की आंखों में पानी आ गया। उसने आगे कहा- साहब, मेरे बच्चे तो अभी भी स्कूल के आसपास मास्टर के इंतजार में बैठे रहते हैं। मास्टर साहब पहले दो-चार दिन में हाजिरी रजिस्टर भरने आते थे। लेकिन अब कहते हैं कि मोबाइल से जब हाजिरी लग जाए तो स्कूल क्यों जाए!

हम मनसुख और उसकी पत्नी के मन की बात सुन रहे थे। इस बीच उसका चार साल का बच्चा रेंगते हुए बाहर आया। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि यह विकलांग है। उसकी मां बोल पड़ी- ‘देखो साहब, दो साल पहले इसे तेज बुखार आया था। सरकारी दवाखाना तो है नहीं गांव में, इसलिए एक गांव के ही साहब को दिखाया था। उन्होंने इंजेक्शन लगा दिया, जिससे बुखार उतर गया। लेकिन तभी से ये अपने पैर पर खड़ा नहीं हो पाया है।’ मां बच्चे को अपनी गोद में बिठा कर दुलार से सिर पर हाथ फेर रही थी।

मनसुख के परिवार के मन की बात मैं अच्छी तरह से समझ गया। ये लोग किस्मत के मारे नहीं हैं, देश की भ्रष्ट व्यवस्था के शिकार हैं। क्या हम ही अपने मन की बात इन्हें सुनाते रहेंगे? या फिर कभी इन गरीबों-वंचितों और किसानों के मन की बात सुन कर उनकी तकलीफों को दूर करेंगे?

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