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बयान की गारंटी

अनूप शुक्ल अक्सर लोगों का मन देशसेवा के लिए हुड़कने लगता है। खासकर चुनाव के समय देशसेवा की ललक सबसे तगड़ी होती है। इस इच्छा की पूर्ति के लिए लोग उसी पार्टी से चुनाव लड़ना चाहते हैं जिसकी सरकार बनने की संभावना होती है। बिना सरकार में शामिल हुए देशसेवा कोई मायने नहीं रखती। सरकार […]

Author April 18, 2015 10:10 PM

अनूप शुक्ल

अक्सर लोगों का मन देशसेवा के लिए हुड़कने लगता है। खासकर चुनाव के समय देशसेवा की ललक सबसे तगड़ी होती है। इस इच्छा की पूर्ति के लिए लोग उसी पार्टी से चुनाव लड़ना चाहते हैं जिसकी सरकार बनने की संभावना होती है। बिना सरकार में शामिल हुए देशसेवा कोई मायने नहीं रखती। सरकार बनाऊ पार्टी के लिए लोग या तो पार्टी बदलते हैं या पहली बार उस पार्टी में शामिल होते हैं। दोनों स्थितियों में पहले के दिए गए बयान बहुत समस्या पैदा करते हैं। पहले जिस पार्टी की ऐसी-तैसी करते रहे, बाद में उसी की तारीफ करने पर लोग बहुत सवाल उठाते हैं। कहते हैं- ‘पहले आप इसको घटिया बताते रहे, अब यह अच्छी पार्टी कैसे हो गई? जिसको गरियाते रहे उसकी जय बोलते हुए कैसा लगता है आपको? जिसका मुंह तोड़ने की मंशा रखते थे, उसके पांव दबाते हुए कैसा महसूस होता है!’

बयान कुछ और बवाल भी करते हैं। कोई पार्टी विपक्ष में रहते हुए जो कहती है, सरकार बनने पर उससे उलट काम करना पड़ता है। सरकार में रहते हुए जिन कामों की वकालत करती रहती रहती है, चुनाव में हार कर विपक्ष में बैठने पर उसी का विरोध करना पड़ता है।
पहले का जमाना होता और बात अखबारों तक सीमित रहती तो कह देते कि अखबार ने मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर छापा है। लेकिन आजकल तो ‘ट्विटर’ और ‘फेसबुक’ का जमाना है। लोग आपकी ही टिप्पणियां आपको दिखा कर पूछते हैं कि ये तो आप ही ने कहा था! अब आप इसके उलट कैसे हो गए? इस हृदय परिवर्तन का कारण क्या है? ‘ट्विटर’, ‘फेसबुक’ और सोशल मीडिया पर दिए गए बयानों का ई-कचरा बहुत दिन तक सुरक्षित रहता है। वहां आपके खिलाफ आपका कोई विरोधी कह सकता है कि आपका आचरण इस बयान के विरुद्ध है। आपकी पॉलिटिक्स क्या है बंधुवर? आप लोगों से अगर कहेंगे कि आपका हृदय परिवर्तन हुआ है तो लोग विश्वास नहीं करेंगे।

पुराने बयानों से होने वाली असुविधा सर्वव्यापी है। सभी राजनीतिक इससे हलकान हैं। ऐसे में इसका यही एक उपाय है कि बयानों की मियाद तय कर ली जाए। हर राजनीतिक अपने बयान की सीमा तय कर दे। जिस तरह गारंटी-वारंटी की मियाद खत्म होते ही ग्राहक का दावा खत्म हो जाता है, उसी तरह बयान की मियाद खत्म होते ही उस बयान पर सवाल बेमानी हो जाएंगे! मसलन, गैर-राजनीतिक रहते हुए दिए गए बयानों की अवधि राजनीति में प्रवेश करते ही समाप्त हो जाएगी; सरकार में रहते हुए दिए गए बयान सरकार गिरते ही अमान्य हो जाएंगे; विपक्ष में रहते हुए दिए गए बयान सरकार बनने की स्थिति में अपने आप निरस्त हो जाएंगे; एक पार्टी में रहते हुए दिए गए बयान दूसरी पार्टी में शामिल होने पर मान्य नहीं होंगे; अलग-अलग समय में दिए गए बयानों में विरोधाभास होने पर सबसे ताजा बयान ही मान्य होगा। ऐसी स्थिति में पुराने बयान की मियाद अपने आप समाप्त मानी जाएगी।

राजनीति में बयानों की मियाद संबंधी यह नियम लागू होने पर देश के अधिक से अधिक लोग देशसेवा के क्षेत्र में आगे आएंगे! देश का धड़ल्ले से विकास होगा! फिलहाल तो चुनाव के समय राजनीति में बयानबाजी को फैशन मान कर ही काम चलाना होगा। जैसा कि सब जानते हैं कि फैशन के दौर में गारंटी का कोई मतलब नहीं होता। देशसेवा के पवित्र भाव के सामने दिए गए बयानों की कोई गारंटी नहीं होती!

 

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