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अपनों का विरोध

वीरेंद्र जैन सत्ता के रिसने से प्यास बुझाने की तमन्ना रखने वाले समर्थकों के विपरीत जब किसी दल के विचारवान लोगों की आवाज उभरती है तो वह सत्ताधीशों के कानों में सायरन की तरह गूंजने लगती है। भाजपा के ‘मोदी-युग’ के एक वर्ष पूरा होने के पहले ही वफादारों की भीड़ के बीच कुछ ऐसे […]

Author May 24, 2015 11:13 AM

वीरेंद्र जैन

सत्ता के रिसने से प्यास बुझाने की तमन्ना रखने वाले समर्थकों के विपरीत जब किसी दल के विचारवान लोगों की आवाज उभरती है तो वह सत्ताधीशों के कानों में सायरन की तरह गूंजने लगती है। भाजपा के ‘मोदी-युग’ के एक वर्ष पूरा होने के पहले ही वफादारों की भीड़ के बीच कुछ ऐसे वरिष्ठ लोगों के स्वर गूंजने लगे हैं जिन्हें भाजपा का ‘थिंक टैंक’ यानी ‘बौद्धिक समूह’ माना जाता रहा है। इन लोगों ने अपने विचारों, तर्कों और व्याख्याओं से भाजपा को न केवल एक हिंदूवादी, सांप्रदायिक और व्यापारियों की उत्तर भारतीय पार्टी की छवि से बाहर निकलने की कोशिश में योगदान दिया है, बल्कि उसे मध्य वर्ग की पार्टी के रूप में पेश करके कॉरपोरेट घरानों और उद्योगपतियों के बीच बिठा दिया है, जहां से मिला सहयोग ही उन्हें देश में सत्ता में बनाए हुए है।

गोविंदाचार्य उन लोगों में हैं जिनकी योजना ने ही 1984 में दो सीटों तक सिमट गई भाजपा को दो सौ सीटों तक पहुंचा दिया था और देशभर में सामान्य जन के बीच रामभक्ति और भाजपा को एक कर दिया था। उन्होंने स्वदेशी नाम से जो आंदोलन छेड़ा था, वह देश को आत्मनिर्भर बनाने की ओर ले जा सकता था। लेकिन भाजपा ने स्वदेशी आंदोलन से किनारा किया और गोविंदाचार्य ने भाजपा से। आज गोविंदाचार्य कह रहे हैं कि मोदी सरकार की दिशा और नीतियां स्पष्ट नहीं हैं; देश के गरीबों, ग्रामीण जनता के लिए अच्छे दिन नहीं आए हैं। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के लिए विकास की नीति का मतलब केवल बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी तक रह गया है, ‘मेक इन इंडिया’ की कोई स्पष्ट रूपरेखा सामने नहीं आई है, जबकि ‘स्मार्ट सिटी’ एक जुमला भर है और हो सकता है कि कुछ कॉरपोरेटों को फायदा हो, पर समाज के निचले पायदान पर बैठे लोगों को कुछ हासिल नहीं होगा।

कभी अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ने वाले राम जेठमलानी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के चयन के समय नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़े थे। लेकिन एक साल पूरा होने से पहले ही वे उनकी सरकार के कटु आलोचक बन गए। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की वैधानिकता पर उन्होंने कहा कि मोदी सरकार न्यायिक नियुक्तियों का राजनीतिकरण कर रही है। पिछले दिनों संसद में उन्होंने विदेशों से काला धन वापस लाने के सरकारी प्रयासों की आलोचना करते हुए कहा कि काले धन पर सरकार सिर्फ हाय-तौबा मचा रही है; सरकार कुछ लोगों को सुरक्षित जगह मुहैया कराना चाहती है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बारे में तो उन्होंने कहा कि पंद्रह लाख रुपया हर एक खाते में जमा कराने के बयान को जुमला बताने वाले पर तो मामला दर्ज होना चाहिए।

अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में विनिवेश मंत्रालय संभालने वाले अरुण शौरी ने मोदी सरकार के कामकाज के तरीकों पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि भाजपा को ‘तिकड़ी’ चला रही है। शौरी ने तो ओबामा दौरे के समय उपहार में मिले महंगे सूट को पहनने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंदुत्ववादियों के बयानों पर चुप्पी साधने के लिए भी नरेंद्र मोदी की आलोचना की। इसी तरह, जब मोदी फ्रांस के दौरे पर थे और राफेल विमानों की खरीद पर बात कर रहे थे, तभी सुब्रह्मण्यम स्वामी ने राफेल विमानों की निरर्थकता बताते हुए इस सौदे को संदेह के घेरे में ला दिया। पिछले दिनों भाजपा ने एक साल की सबसे बड़ी उपलब्धि भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला सामने न आना बताया था। लेकिन ‘होना’ और ‘प्रकाश में न आ पाना’ दो अलग-अलग चीजें हैं। लोकायुक्त, मुख्य सतर्कता अधिकारी आदि के बिना किसी घोटाले के होने या न होने का पता कैसे चलेगा। भाजपा के ‘प्रवक्ताओं’ की बातों का तो कोई भरोसा नहीं करता, लेकिन कुछ गंभीर और बौद्धिक माने जाने वालों की आलोचना नींव का खोखलापन बताती है।

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