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सृजन बनाम नियति

रामप्रकाश कुशवाहा

मनुष्य ने राजनीति का जो तंत्र विकसित किया है, उस पर भी न्यूटन के गति जड़त्व के नियम लागू होते हैं। जैसे हर चलती हुई चीज अनंत काल तक चलते रहना चाहती है, वैसे हर सत्ताधारी सत्ता में बने रहना चाहता है। लोकतंत्र में भी एक बार यह मान लेने के बाद कि सबके लिए प्रधानमंत्री होना संभव नहीं है- नियतिवाद प्रकारांतर से वापस लौट आता है। भारत में आजकल ऐसी ही स्थिति बन गई है और सबके प्रधानमंत्री बन सकने की लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक अवधारणा निम्न और मध्यवर्ग के लिए दूर की कौड़ी ही हो गई है। हालांकि यहां प्रधानमंत्री होना एक प्रतीकात्मक दृष्टांत है। यह जरूरी नहीं है कि सभी लोग सिर्फ प्रधानमंत्री बनने के बारे में ही सोचें। आशय यह है कि सोचें तो भी शक्तियों और समीकरणों की वैसी बाधा न हो, जो उनके होने को असंभव कर दे।

इसका विलोम यह है कि लोग इतने हताश हो जाएं कि छोटा आदमी बड़ा होने या एक दुखी आदमी सुखी होने के बारे में सोचना छोड़ दे। इस दृष्टि से देखें तो दुनिया के सारे धर्म मानवीय सृजनशीलता को हतोत्साहित करते हैं। बहुत पहले मुझे परीक्षा देने के लिए एक ऐसे ग्रामीण परिवार में ठहरना पड़ा था, जिसके घर में चेचक निकली थी और उसी के दीवार के बाहर लिखा था कि चेचक की सूचना देने वाले को पांच हजार रुपए का ईनाम दिया जाएगा। यह सब कुछ एक मनोवैज्ञानिक हत्या की तरह होता है कि छोटा आदमी हमेशा के लिए अपने छोटेपन को या एक निर्धन अपनी निर्धनता को स्वीकार कर ले।

यह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति की दृष्टि से न सिर्फ नकारात्मक है, बल्कि समाज के लिए अस्वस्थकर भी है। यह व्यवस्था के परिवर्धन और परिष्करण की आशा और आस्था की मनोभावना को ही ध्वस्त कर देता है। एक निष्क्रिय-निठल्ला निराशावादी कुंठाग्रस्त समाज अगर अपनी सृजनशीलता और विवेकपूर्ण प्रतिरोध से अपने पर्यावरण को बदल सकने का जादू भूल जाता है तो इससे दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है! यहां मेरा आशय उस सामूहिक सृजनशीलता से है जो राजनीतिक व्यवहार के क्षेत्र में आंदोलन और क्रांतियों के रूप में भी प्रकट होते रहे हैं। इससे यह रहस्य भी अनावृत्त होता है कि अध्यात्मवाद का मानवीय सृजनशीलता और उसके हस्तक्षेप से विरोध क्यों है!

नियतिवाद अपने वैज्ञानिक अर्थों में तो कार्य-कारण की एक सुसंगत और अपरिहार्य शृंखला को व्यक्त करता है, लेकिन अपने समर्पणवादी आध्यात्मिक अर्थ में यथास्थितिवाद को बढ़ावा देता है। जब आग लगी हो और उस समय अगर कोई आंखें बंद किए लेटा कुछ सोच रहा हो तो उसकी आंखें तब तक नहीं खुल सकतीं, जब तक वह खुद न जलने न लगे। कई बार जब हम जीने की सोचते हैं तो हमारा रुग्ण-जर्जर शरीर बिना हमसे पूछे ही हमारे मरने की घोषणा कर देता है।

कई लोग जो आनुवंशिक रूप से अच्छे होते हैं, न कभी बीमारी के बारे में सोचते हैं और न बीमार होते हैं। कुछ जिंदगी भर बीमारी के बारे में सोचते रहते हैं और कभी बीमार नहीं होते। जबकि कुछ ऐसे भी अभागे होते हैं जो बिना सोचे ही बीमारी की चपेट में पड़ जाते हैं। यह कहा जा सकता है कि हमारा जिंदगी भर बीमार या स्वस्थ होना एक संयोग भी हो सकता है। शायद इसीलिए गीता में पाचवां हिस्सा यानी बीस प्रतिशत ही ‘दैव’ यानी नियति को दिया गया है। इसी बीस प्रतिशत के अप्रत्याशित में ईश्वर का भय छिपा है। लेकिन यह नियति वाले ईश्वर के बारे में है।

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