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बीरेंद्र सिंह रावत उन्नीस जनवरी, 1931 को गोलमेज सम्मेलन में डॉ भीमराव आंबेडकर ने कहा था- ‘मुझे खुशी है कि मैं उस वर्ग के देशभक्तों में शामिल नहीं हूं।’ वे किस वर्ग के देशभक्तों से खुद को अलग कर रहे थे? इस वक्तव्य से यह साफ है कि अपने अवलोकन और विश्लेषण से उन्होंने पाया […]

Author May 11, 2015 8:34 AM

बीरेंद्र सिंह रावत

उन्नीस जनवरी, 1931 को गोलमेज सम्मेलन में डॉ भीमराव आंबेडकर ने कहा था- ‘मुझे खुशी है कि मैं उस वर्ग के देशभक्तों में शामिल नहीं हूं।’ वे किस वर्ग के देशभक्तों से खुद को अलग कर रहे थे? इस वक्तव्य से यह साफ है कि अपने अवलोकन और विश्लेषण से उन्होंने पाया कि उस समय भारत में देशभक्तों के एक से अधिक वर्ग थे। उनकी समझ से देशभक्ति एकवचन में न होकर बहुवचन में थी। वे समझ चुके थे कि देशभक्ति एक भाव, एक विचार और एक कार्ययोजना लिए हुए नहीं थी। वे देख रहे थे कि एक प्रकार की देशभक्ति दूसरी प्रकार की देशभक्ति के विरोध में काम कर रही है। इसीलिए वे एक खास किस्म की देशभक्ति से खुद को अलग कर रहे थे।

उनके मुताबिक, ‘भारत एक अनोखा देश है और उसके राष्ट्रवादी और देशभक्त भी अनोखे लोग हैं।’ इन राष्ट्रवादियों और देशभक्तों के अनोखेपन को समझाते हुए उन्होंने कहा था- ‘भारत में राष्ट्रवादी और देशभक्त वह है जो अपनी खुली आंखों से अपने साथियों के साथ ऐसा व्यवहार होते हुए देखता है, मानो वे इंसान से कमतर हों। लेकिन इसके विरोध में उसकी मानवता नहीं जगती। वह जानता है कि बिना किसी कारण के पुरुष और महिलाओं को उनके मानवाधिकारों से वंचित रखा जाता है। लेकिन इससे उसका नागरिक बोध उसे सताता नहीं और वह उनकी मदद के लिए आगे नहीं बढ़ता। वह देखता है कि एक पूरे वर्ग को सार्वजनिक रोजगार से पूरी तरह बाहर रखा जाता है।

लेकिन यह जानकारी उसमें न्याय और निष्पक्षता का विचार पैदा नहीं कर पाती।’ ऐसे राष्ट्रवादी और देशभक्त के अनोखेपन पर प्रकाश डालते हुए वे आगे कहते हैं कि ‘उसके द्वारा हजारों विनाशकारी परंपराओं को सोचा गया जो व्यक्ति और समाज को घायल कर रहीं हैं। लेकिन ये बातें उसे आक्रोशित और दुखी नहीं कर पातीं। ऐसे देशभक्त की एक ही पुकार रहती है- अपने और अपने वर्ग के लिए शक्ति और ज्यादा शक्ति। मुझे खुशी है कि मैं उस वर्ग के देशभक्तों में शामिल नहीं हूं।’ आंबेडकर का इशारा वर्ण और जाति आधारित परंपराओं के साथ-साथ लैंगिक आधार पर रची गई शोषणकारी और उत्पीड़नकारी परंपराओं की तरफ भी था। इसके बाद आंबेडकर कहते हैं कि ‘मैं उस वर्ग का राष्ट्रवादी और देशभक्त हूं जो लोकतंत्र के आधार पर अपना पक्ष तय करता है और जो किसी भी आकार और रूप में एकाधिकार का विनाश चाहता है।’

आज ऐसे संगठन जिनका राजनीतिक और सांस्कृतिक दर्शन एकाधिकारवाद का है, वे आंबेडकर को अपने जैसा बता रहे हैं। इन संगठनों का एकाधिकारवाद केवल धार्मिक आधार लिए हुए नहीं है। ये जाति, वर्ण और लैंगिक आधार पर भी एकाधिकारवादी हैं। जो राज्य-व्यवस्था धर्म, वर्ण और जाति जैसे जन्म-निर्धारित संकल्पनाओं पर टिकी होगी, उनमें सभी की और खासकर स्त्रियों की आजादी के लिए जगह नहीं होगी।

एक तरफ आंबेडकर लोकतंत्र के आधार पर अपना पक्ष रखने पर अडिग दिखते हैं तो दूसरी तरफ गोलवलकर ने 1969 में कहा कि ‘कुछ लोगों के स्वार्थ को बढ़ावा देकर समाज को विच्छिन्न करने वाली प्रजातंत्र के समान दूसरी प्रणाली नहीं है।’ (श्री गुरुजी समग्र, खंड-4, सुरुचि प्रकाशन) यही नहीं, गोलवलकर को ‘भारतीय’ शब्द पर भी एतराज था। इसी किताब में यह दर्ज है कि ‘आजकल ‘भारतीय’ शब्द के प्रयोग पर बल दिया जाता है। किंतु ‘हिंदू’ के स्थान पर ‘भारतीय’ शब्द का प्रयोग भी भ्रम निर्माण करने के लिए ही किया जाता है।’ ऐसे बहुत सारे तथ्य हमारे सामने हैं और जो लोग धर्म आधारित राष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, वे आंबेडकर को अपने जैसा बता रहे हैं। ऐसे लोगों और समूहों से सावधान रहने की जरूरत है।

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